भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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४०८ पञ्चदशी करता है [वह किसी के प्रकाश के लिए घटता बढ़ता नहीं है और जब नृत्यशाला में से ये सब लोग चले जाते हैं] जब वहां कोई भी नहीं रहता तब भी वह वहां दीप्त हुआ रहता है। अहंकारं धियं साक्षीं विषयानपि भासयेत् । अहंकाराद्यभावेऽपि स्वयं भात्येव पूर्ववत् ॥११॥ ऊपर के दृष्टान्त की तरह ही यह साक्षी तत्व अहंकार को, बुद्धि को और विषयों को, प्रकाशित किया करता है। [सुषुप्ति आदि के समय] जब तो अहंकार आदि कोई भी नहीं रहता, तब भी वह [साक्षी] पहले ही की तरह जगमगाता रहता है। निरन्तरं भासमाने कूटस्थे ज्ञप्तिरूपतः । तद्भासा भास्यमानेयं बुद्धिर्नृत्यत्यनेकधा ॥१२॥ वह कूटस्थ साक्षी तो ज्ञप्ति [किंवा स्वप्रकाश चैतन्य] रूप से सदा ही भासता रहता है। यह बिचारी बुद्धि उसी [सदा- विभात] साक्षी की प्रभा से प्रकाश्यमान होकर, अनेक रूप से नाचा करती है। ['यह घट है' 'यह पट है' इत्यादि अनेक रूपों में विकृत होती रहती है।] अहंकारः प्रभुः, सभ्या विषया, नर्तकी मतिः । तालादिधारीण्यक्षाणि दीपः साक्ष्यवभासकः ॥१३॥ अहंकार ही इस [जगतरूपी] नाटक का प्रभु है [क्योंकि नाटक के मालिक की तरह विषय भोग-की सफलता और विफ- लता से हर्ष और विषाद् इसी अहंकार को होते हैं] विषय ही इस नाटक के सभ्य हैं [नाटक के दर्शकों को सुख दुःखमयी घटना देखने पर भी जैसे सुख दुःख कुछ नहीं होता, इसी प्रकार इन विषयों को भी सुख दुःख कुछ नहीं होता] बुद्धि ही इस