भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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नाटकदीपप्रकरणम् ४०९ नाटक की नर्तकी है [क्योंकि नर्तकी की तरह नाना तरह के विकार इसी में होते हैं]। ताल आदि को धारण करने वाली तो इन्द्रियां ही हैं [क्योंकि ये इन्द्रियां बुद्धि के विकारों के अनु- कूल व्यापार करने लगती हैं]। यह साक्षी ही इन सब का अवभासक दीपक है [क्योंकि यही इन सब को प्रकाशित किया करता है।] स्वस्थानसंस्थितो दीपः सर्वतो भासयेद् यथा । स्थिरस्थायी तथा साक्षी बहिरन्तः प्रकाशयेत् ॥१४॥ दीपक जैसे अपने स्थान पर ही रक्खा हुआ अपने चारों ओर [के सम्पूर्ण पदार्थों को] प्रकाशित किया करता है, इसी प्रकार स्थिर रूप से स्थायी यह साक्षी भी (विकारी न होकर ही) बाहर और अन्दर प्रकाश किया करता है। बहिरन्तर्विभागोऽयं देहापेक्षो न साक्षिणि । विषया बाह्यदेशस्था देहस्यान्तरहंकृतिः ॥१५॥ ['अनन्तरमबाह्यम्' (बृ० ३-८-८) इत्यादि बृहदारण्यक श्रुति के अनुसार साक्षी में तो अन्दर और बाहर का कोई भी विभाग नहीं होता] यह सब बाहर अन्दर का विभाग तो देह [रूपी पैमाने] के कारण ही हो जाता है। विषय तो शरीर से बाहर रहते हैं। अहंकार तो शरीर के अन्दर होता है। [इसीसे अन्दर बाहर यह व्यवहार होने लगा है। आत्मा में अन्दर बाहर कहते नहीं बनता।] अन्तःस्था धीः सहैवाक्षै र्बहिर्याति पुनः पुनः । भास्यबुद्धिस्थचाञ्चल्यं साक्षिण्यारोप्यते वृथा ॥१६॥ शरीर के अन्दर बैठी हुई वह बुद्धि