पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 432, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें४१० पंचदशी करने के लिए ] इन्द्रियों के साथ साथ [अथवा इन्द्रियों के द्वारा] बार बार बाहर निकला करती है। बस बुद्धि की इसी चंचलता को [बुद्धि के भासक] साक्षी में वृथा ही आरोपित कर लिया जाता है। [ उस साक्षी में वास्तविक चंचलता नहीं है।] गृहान्तरगतः खल्पो गवाक्षादातपोऽचलः । तत्र हस्ते नर्त्यमाने नृत्यतीवातपो यथा ॥१७॥ निजस्थानस्थितः साक्षी बहिरन्तर्गमागमौ । अकुर्वन् बुद्धिचाञ्चल्यात् करोतीव तथा तथा ॥१८॥ झरोखे में होकर घर में गया हुआ नन्हा सा सूर्यप्रकाश, अचल ही होता है। [वह हिलता जुलता नहीं है] उस आतप के बीच में जब कोई पुरुष अपना हाथ हिलाने लगता है, तब जिस प्रकार वह आतप भी हिलने सा लगता है, ठीक इसी प्रकार साक्षी तो अपने ही स्थान में [किंवा अपनी अचल मर्यादा में ] बैठा रहता है, वह कभी बाहर अन्दर आता जाता नहीं है। परन्तु फिर भी बुद्धि की चंचलता के कारण, वैसा वैसा करता हुआ सा [ व्यर्थ ही] प्रतीत होने लगता है। न बाह्यो नान्तरः साक्षी बुद्धेर्देशौ हि तावुभौ । बुद्ध्याद्यशेषसंशान्तौ यत्र भात्यस्ति तत्र सः ॥१९॥ [ पहिले श्लोक में जो साक्षी को अपने स्थान पर स्थित बताया है उसका अभिप्राय सुन लो ] वह साक्षी बाह्य या आन्तर कभी नहीं होता। ये तो दोनों बुद्धि के ही देश कहाते हैं। बुद्धि तथा इन्द्रिय आदि की प्रतीति के बन्द होने पर यह भाव अथवा यह प्रकाश, जहाँ [ स्वतन्त्र रूप से ] जगमगाता रहता है, उसी को इस साक्षी का स्थान समझ लो।