पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४१२ पञ्चदशी को पूछो तो हम कहेंगे कि ] वह स्वयं तो वाणी और बुद्धि का अविषय ही है [ फिर उसे साक्षी भी कैसे कह दें ? ] कथं तादृङ् मया ग्राह्य इति चेन्मैव गृह्यताम् । सर्वग्रहोपसंशान्तौ स्वयमेवावशिष्यते ॥२३॥ यदि वह साक्षी अवाङ् मनोगोचर है तो फिर मैं मुमुक्षु ऐसे उसको कैसे ग्रहण करूँ ? इसका उत्तर यही है कि—उसे तुम ग्रहण ही मत करो ! [तुम ग्रहण करने के झगड़े में ही मत फंसो] जब सर्वग्रह शान्त हो जायगा [जब इस सब कुछ कहाने वाले द्वैत की प्रतीति बन्द हो जायगी ] तब समझते हो क्या शेष रह जायगा ? देखो उस समय यह स्वयं ही शेष रह गया होगा [इसी को हम साक्षी कहते हैं । इसी को हम वाणी और बुद्धि का अगोचर बताते हैं ।] न तत्र मानापेक्षास्ति स्वप्रकाशस्वरूपतः । तादृग्व्युत्पत्यपेक्षा चेच्छ्रुतिं पठ गुरोर्मुखात् ॥२४॥ सर्वग्रह की शान्ति हो जाने पर जो स्वात्मा शेष रहता है, उसके प्रत्यक्ष के लिए प्रमाण की कुछ भी आवश्यकता नहीं है। क्योंकि वह तो स्वयं प्रकाश-स्वरूप ही है । वह आत्मा स्वयं प्रकाशस्वरूप कैसे है ? यह जानना हो तो गुरु के मुख से वेदान्त का अध्यन करो । [ इस गहन तत्व का ज्ञान तुम्हारे स्वतन्त्र स्वाध्याय से या किसी ग्रन्थ का अनुवाद पढ़ने से नहीं हो सकेगा । यह बात तो अनुभव वाला ही समझा सकेगा ] यदि सर्वग्रहत्यागोऽशक्यस्तर्हि धियं व्रज । शरणं, तदधीनोऽन्तर्बहिष्वैषोऽनुभूयताम् ॥२५॥