भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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तत्त्वविवेकप्रकरणम् २७ चतुर्थ विकल्प के आधार का विशेषण विकल्प यदि विकल्पान्तर है तो उसमें भी इन दोषों का प्रसंग होने से उसके आधार का विशेषण विकल्प भी विकल्पान्तर ही मानना होगा। इस प्रकार अनेक विकल्पों के होने से अनवस्था होगी। कहीं भी जाकर स्थिति नहीं हो सकेगी। इदं गुणक्रियाजातिद्रव्यसम्बन्धवस्तुषु । समं, तेन स्वरूपस्य सर्वमेतदितीष्यताम् ॥५१॥ गुण, क्रिया, जाति, द्रव्य तथा सम्बन्धादि सभी वस्तुओं में यह दोष तुल्य ही है। इसलिये [ऐसे निरर्थक प्रश्न न करके] यही मान लेना चाहिये, कि ये गुण आदि सब स्वरूप में ही रहते हैं। विकल्पतदभावाभ्यामसंस्पृष्टात्मवस्तुनि । विकल्पतत्वलक्ष्यत्वसम्बन्धाद्यास्तु कल्पिताः ॥५२॥ जो आत्मवस्तु विकल्प और विकल्पाभाव दोनों के ही सम्बन्ध से रहित रहती है, उसी आत्मवस्तु में 'सविकल्पकत्व' 'लक्ष्यत्व' 'निर्विकल्पकत्व आदि सब धर्म [उसी तरह] कल्पित कर लिये गये हैं [जैसे कि आकाश आदि सब जगत् उसमें कल्पित कर लिया गया है]। इत्थं वाक्यैस्तदर्थानुसन्धानं श्रवणं भवेत् । युक्त्या सम्भावितत्वानुसन्धानं मननं तु तत् ॥५३॥ इस प्रकार वाक्यों के द्वारा उनके अर्थों का ज्ञान 'श्रवण' कहाता है। युक्ति से उसी अर्थ की सम्भावना का ज्ञान 'मनन' कहा जाता है। 'जगतो यदुपादानम्' [४४] इत्यादि श्लोकों से प्रतिपादित रीति से 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों की सहायता से, इन वाक्यों

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