पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३७ कुमारादिवदेवायँ ब्रह्मानन्दैकतत्परः । स्त्रीपरिष्वक्तवद् वेद न बाह्यं नापि चान्तरम् ॥५४॥ प्रकृत में तो हमें यही कहना है कि स्तनपायी कुमार या महाराजा आदि जैसे आनन्द में मग्न रहते हैं ऐसे ही यह सुषुप्त प्राणी केवल ब्रह्मानन्द को भोगा करता है। तद्यथा प्रियया स्त्रिया संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरम् (बृ. ४-३-२१) इस वाक्य में कहा गया है कि जैसे कोई कामी स्त्री का आलिंगन कर लेने पर अन्दर बाहर के विषयज्ञान से शून्य होकर सुख की मूर्ति हो जाता है इसी प्रकार सुषुप्ति के समय प्राज्ञ परमात्मा के साथ एकता को प्राप्त हुआ यह जीव भी बाह्य और आन्तर कुछ भी नहीं जानता और आनन्दरूप हो गया होता है । बाह्यं रथ्यादिकं वृत्तं, गृहकृत्यं यथान्तरम् । तथा जागरणं बाह्यं, नाडीस्थः स्वप्न आन्तरः ॥५५॥ [ऊपर के वाक्य में जो बाह्य और आन्तर दो शब्द आये हैं उनके अर्थ यों जानने चाहियें] जैसे लोक में गली कूर्चा आदि बाह्य तथा घर के काम आन्तर कहाते हैं, इसी प्रकार जागरण को ‘बाह्य’ कहा जाता है तथा नाड़ी में प्रतीत होने वाला स्वप्नप्रपंच ‘आन्तर’ कहाता है । पितापि सुप्तावपितेत्यादौ जीवत्ववारणात् । सुप्तौ ब्रह्मैव नो जीवः संसारित्वासमीक्षणात् ॥५६॥ अत्र पिताऽपिता भवति (बृ. ४-३-२२) इत्यादि श्रुति में कहा गया है कि—सुप्तिकाल जब आता है तब पिता पिता नहीं रहता । यों जीवत्व का वारण कर दिया है कि सुप्ति के