भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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५३८ पञ्चदशी समय ब्रह्म ही रह जाता है जीव नहीं रहता । क्योंकि उस समय संसारिभाव का कहीं पता ही नहीं चलता [भाव यह है कि- सुप्ति में जीव के जो आध्यासिक पितृत्व आदि धर्म हैं वे नहीं रहते । जीवभाव की प्रतीति के बन्द हो जाने पर अर्थात् ही ब्रह्मभाव शेष रह जाता है । ] पितृत्वाद्यभिमानो यः सुखदुःखाकरः स हि । तस्मिन्नपगते तीर्णः सर्वाञ्छोकान् भवत्ययम् ॥५७॥ तीर्णो हि तदा सर्वाञ्शोकान् हृदयस्य भवति (बृ. ४-३-२२) इस वाक्य में बताया गया है कि-पितापने आदि का जो अभिमान है वही तो सुख दुःख का आकर है । जब वह अभि- मान नहीं रह जाता तब यह जीव सब शोकों के पार पहुँच जाता है [यह संसार देहाभिमानमूलक है । जब देहाभिमान नहीं रहता तब संसार भी नहीं रहता । देहाभिमान के भूलते ही सब प्रकार के शोक समाप्त हो जाते हैं । ] सुषुप्तिकाले सकले विलीने तमसावृतः । सुखरूपमुपैतीति ब्रूते ह्याथर्वणी श्रुतिः॥५८॥ आथर्वणी श्रुति कहती है कि-यह सकल [जाग्रदादि] प्रपंच जब [अपनी उपदान, तमःप्रधान प्रकृति में] विलीन हो जाता है तब उसी तमोमयी प्रकृति से ढका हुआ यह जीव सुख रूप [ब्रह्म] को प्राप्त हो जाता है । सुखमस्वाप्समत्राहं न वै किंचिदवेदिषम् । इति सुप्ते सुखाज्ञाने परामृशति चोत्थितः ॥५६॥ [सबका अनुभव भी इसी बात को कह रहा है कि-] 'इस समय मैं सुख पूर्वक सोया । इतने समय मैंने कुछ भी नहीं