भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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४४६ पञ्चदशी अहदी लोग सभी कृतार्थ हो जाने चाहिये । फिर श्रवणादि परिश्रम की क्या आवश्यकता रह जायगी ? बाढं, ब्रह्मेति विद्युश्चेत् कृतार्था स्तावतैव ते । गुरुशास्त्रे विनात्यन्तं गम्भीरं ब्रह्म वेत्ति कः ॥७८॥ ‘यह ब्रह्मानन्द है’ ऐसा यदि कोई उनमें से पहचान जाय तो वह अवश्य ही कृतार्थ हो कर रहे । परन्तु गुरु और शास्त्र के बिना [मन वाणी से अगम्य सर्वज्ञ सर्वान्तर सर्वात्मरूप] उस गम्भीर ब्रह्म को और किस उपाय से कौन जान सकता है ? [अर्थात् गुरु और शास्त्र के बिना इस तत्व का पता नहीं चलता] जानाम्यहं त्वदुक्त्याद्य कुतो मे न कृतार्थता । शृण्वत्र त्वादृशो वृत्तं प्राज्ञंमन्यस्य कस्यचित् ॥७९॥ यदि यह पूछा जाय कि—तुम्हारे कहने से मैं ब्रह्मानन्द को जान तो गया हूँ परन्तु मैं कृतार्थ क्यों नहीं हो पाया हूँ ? इसके उत्तर में अपने जैसे किसी प्राज्ञाभिमानी का वृत्तान्त सुन लीजिये । चतुर्वेदविदे देयमिति शृण्वन्नवोचत । वेदाश्चत्वार इत्येवं वेद्मि मे दीयतां धनम् ॥८०॥ किसी तुम्हारे जैसे ने यह सुना था कि—चतुर्वेदज्ञ को यह बहुत सा धन दे दो । बस इस बात को सुन कर वह कह उठा कि वेद चार हैं यह तो मैं जानता ही हूँ और यों मैं चतु- र्वेदज्ञ हो गया हूँ, इस कारण यह धन मुझे ही दे दो [ इसी तरह तुम भी कहते हो कि मैं ब्रह्मज्ञ हो गया हूँ मैं कृतार्थ क्यों नहीं हुआ ?]