भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पृष्ठ 469

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४७ संख्यामेवेष जानाति न तु वेदानशेषतः । यदि तर्हि त्वमप्येवं नाशेषं ब्रह्म वेत्सि हि ॥८१॥ यह तो संख्या को ही जानता है, वेदों के स्वरूप को यह सम्पूर्ण रीति से नहीं जानता है, ऐसा यदि तुम कहो तो हम कहेंगे कि तुम भी तो ऐसे ही सम्पूर्ण ब्रह्म को नहीं जानते हो । अखण्डैकरसानन्दे मायातत्कार्यवर्जिते । अशेषत्वसशेषत्ववार्ताविसर एव कः ॥८२॥ [शंका करने वाला कहता है] जो अखण्ड एक रस आनन्द है, जिसमें माया और उसका कार्य कुछ भी नहीं है, उसमें सम्पूर्ण और अधूरे की बात को अवसर ही कहाँ है ? शब्दानेव पठस्याहो तेषामर्थं च पश्यसि । शब्दपाठेऽर्थबोधस्ते संपाद्यत्वेन शिष्यते ॥८३॥ [उत्तर] 'अखण्डैकरस' 'अद्वितीय' 'सच्चिदानन्दरूप' इत्यादि शब्द ही शब्द कहना जानते हो अथवा उनका जो स्वगतादि- भेदशून्यता रूपी गम्भीर अर्थ है उसको भी पहचानते हो ? क्योंकि मुख से शब्दों का उच्चारण कर देने पर भी तुम्हें अर्थ बोध करना शेष रह ही जाता है । अर्थे व्याकरणाद् बुद्धे साक्षात्कारोंऽवशिष्यते । स्यात् कृतार्थत्वधीर्यावत् तावद् गुरुमुपास्व भोः ॥८४॥ व्याकरणादि से परोक्षज्ञान जब कर लिया जाता है, तब भी संशयादि को हटा कर प्रत्यक्ष करना शेष रह ही जाता है। जब तक तुम्हारी बुद्धि तुम्हें अपने कृतार्थ होने का नीरव संदेश न सुनादे तब तक तुम गुरु की उपासना करते रहो। [जब कृतार्थत्व बुद्धि उत्पन्न हो जाय तभी ज्ञान की सम्पूर्णता समझ लेना]