पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४५४ पञ्चदशी
निद्रा नहीं कह सकते [निद्रा तो वही है जब कि बुद्धि कारण रूप में पहुँच गई हो] अन्तःकरण के स्वरूप का विलय न होने से ही योगी का देह निद्रा की तरह गिर नहीं पड़ता [इससे समझ लेना चाहिए कि अन्तःकरण का स्वरूप अभी विलीन नहीं हुआ है।] न द्वैतं भासते नापि निद्रा तत्रास्ति यत् सुखम् । स 'ब्रह्मानन्द' इत्याह भगवानर्जुनं प्रति ॥१००॥ गीता के छठे अध्याय में भगवान् ने अर्जुन के प्रति कहा है कि—जिस समय द्वैत का भान बन्द हो जाय, और नींद भी न आय, उस समय जो सुख किसी को भासता हो, बस वही 'ब्रह्मानन्द' है। शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥१०१॥ गीता के ब्रह्मानन्दबोधक वे श्लोक ये हैं—धीर बुद्धि के सहारे से धीरे धीरे मन की उपरति की साधना करो। जब मन को आत्मसंस्थ कर चुको [जब मन को यह निश्चय करा चुको कि यह सब कुछ आत्मा ही है 'आत्मा से भिन्न यह कुछ भी नहीं है'] तब बस फिर कुछ भी न सोचो। [यह तो योग की अन्तिम हालत है।] यतो यतो निश्चरति मनश्चंचलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥१०२॥ [ऐसी ऊँची अवस्था को जो योगी लाना चाहें वह पहले यह करें कि] जो मन [स्वभाव दोष से ही] चंचल है, जो अस्थिर है [जो एक विषय में बंध कर कभी नहीं रहता] ऐसा मन जिस