भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५५ जिस शब्दादि कारण को लेकर बाहर निकल पड़ता हो, उस उस शब्दादि की ओर से उसे रोक कर [ उन उन शब्दादियों के मिथ्यात्व आदि दोष दिखा कर, उसे वैराग्य का उपदेश देकर, वहाँ से हटा कर] आत्मा के वश में करता जाय। [इस प्रकार योगाभ्यासी पुरुष का मन अभ्यास के प्रताप से आत्मा में ही शान्त होने लगेगा । ] प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्। उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥१०३॥ [ मन के शान्त होने पर जो होता है उसे भी सुन लो । संसार की मोह ममता आदि ही बड़े क्लेश कहाते हैं। ये क्लेश रजोगुण से उत्पन्न होते हैं] वह रजोगुण जिसका शान्त हो चुका हो, इसी कारण जिसका मन प्रशान्त हो गया हो [ जिसके मन में विक्षेपों का उठना सर्वथा रुक गया हो। 'यह सब ब्रह्म ही है' इस निश्चय के कारण] जिसे ब्रह्मभाव की प्राप्ति हो गई हो जो [जीवन्मुक्त हो गया हो] जो अकल्मष अर्थात् धर्माधर्म से छूट चुका हो, ऐसे इस योगी को ही उत्तम सुख मिलता है [अर्थात् उस सुख के क्षय हो जाने या उसस अधिक सुख के होने का दोष नहीं होता । ] यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया। यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥१०४॥ सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्वतः ॥१०५॥ यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥१०६॥