पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 478, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें४५६ पञ्चदशी तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥१०७॥ [ऊपर के संक्षिप्त अर्थ को गीता में ही विस्तार पूर्वक यों समझाया गया है कि] जिस समय चित्त योगसेवा के प्रताप से सब विषयों से हटकर उपराम को पा लेता है, जिस समय समाधिभावना से शुद्ध किये हुए अन्तःकरण के द्वारा आत्मा अर्थात् ज्योतिः स्वरूप पर चैतन्य को देख देख कर [विषयों में नहीं किन्तु] अपने आप में ही तुष्ट होने लगता है॥१०४॥ जिस समय आत्मा में स्थित हुआ यह योगी आत्यन्तिक [अर्थात् अनन्त] तथा केवल बुद्धि से गृहीत होने वाले अतीन्द्रिय [अर्थात् इन्द्रियों की पकड़ में न आने वाले किंवा विषयों से उत्पन्न न होने वाले ऐसे किसी अपूर्व] सुख का अनुभव किया करता है। उस आत्मा में स्थित हुआ यह योगी उस आत्म तत्व से च्युत नहीं होता [अर्थात् उसे कभी नहीं भूलता] ॥१०५॥ जिस आत्मा को पाकर दूसरे लाभों को उससे अधिक मानना छोड़ देता है, जिस आत्मतत्व में स्थित हुआ यह योगी बड़े भारी दुःखों से भी [शस्त्रों के भयंकर घावों से भी—प्रह्लाद के समान] विचलित नहीं होता ॥१०६॥ दुःखों के संयोगों का वियोग कर देने वाली उस पवित्र अवस्था को ही 'योग' जान लो। जिस 'योग' का वर्णन पहले कर चुके हैं उस 'योग' को निश्चय [अर्थात् अध्यवसाय] से निर्वेद रहित मन से करना चाहिए ॥१०७॥ युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥१०८॥