भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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द्वैतानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५७ विगतकल्मष अर्थात् योग में आने वाले विघ्नों को पार कर डालने वाला यह योगी, सदा ऊपर कही रीति से आत्मा का अनुसन्धान करता करता करता, बिना ही प्रयास के ब्रह्म सम्बन्धी [अर्थात् अविनाश्वर सर्वातिशायी ] सुख को पा लेता है । उत्सेक उदधे र्यद्वत् कुशाग्रेणैकविन्दुना । मनसो निग्रहस्तद्वद् भवेदपरिखेदतः ॥१०९॥ कुशाग्र से उठाई हुई एक एक बूंद से समुद्र का उत्सेक अर्थात् बहिःसेचन किया जाय तो यह किसी समय में जाकर तभी हो सकता जब कि इस काम से कभी भी खिन्न न हुआ जाय और इस काम को लगातार जारी रखा जाय । ठीक इसी प्रकार मन का निग्रह भी यदि अखिन्न होकर किया जाय तो काल पाकर हो ही सकता है। [इस रीति से समुद्र को सुखा डालने का जैसा पक्का धीरज टिट्टिभी में था वैसा दृढ निश्चय करके यदि कोई बैठ जाय तभी मन का निग्रह किया जा सकता है] एक टिट्टिभी के अण्डों को समुद्र ने बहा लिया था। अपने अण्डों को निकालने के लिए उस टिट्टिभी ने समुद्र को सुखा- देने का निश्चय किया । अब वह अपनी चोंच में एक एक बूंद लाती थी और समुद्र से बाहर डाल जाती थी। उस टिट्टिभी में उस बड़े समुद्र को सुखा देने का इतना लम्बा अखण्ड धीरज था। वैसा लम्बा अखण्ड धीरज जिन साधकों में होगा वे ही मन का निग्रह कर सकेंगे। जो तो यह सोचते होंगे कि हमें प्रयत्न करते करते महीनों बीत गए अभी तक मनोनिग्रह नहीं हो पाया ऐसे अधीर साधक लोग इस मार्ग में अवश्य ही निराश होंगे।