पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 480, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें४५८ पञ्चदशी बृहद्रथस्य राजर्षेः शाकायन्यो मुनिः सुखम् । प्राह मैत्रारूयशाखायां समाध्युक्तिपुरःसरम् ॥११०॥ गीता में ही नहीं मैत्रायणी शाखा में भी शाकायन्य नाम के किसी मुनि ने, अपने शिष्य बने हुए बृहद्रथ राजर्षि के प्रति ब्रह्मसुख का कथन समाधि का वर्णन करके किया है। यथा निरिन्धनो वह्निः स्वयोनावुपशाम्यति । तथा वृत्तिक्षयाच्चित्तं स्वयोनावुपशाम्यति ॥१११॥ [उस में कहा गया है कि] ईधन को जला चुकने वाली अग्नि जैसे अपने कारण [अग्नि] में ही शान्त हो जाती है [अपने लपट आदि विशेष आकारों को छोड़ कर केवल अग्नि मात्ररूप में आ जाती है] ठीक इसी प्रकार यह अन्तःकरण भी निरोध समाधि का अभ्यास करने से राजस आदि सब वृत्तियों के नष्ट हो जाने के कारण अपनी योनि अर्थात् केवल सत्त्वरूप में शान्त हो जाता है [उस समय सत्व ही सत्व शेष रह जाता है अन्तःकरण नहीं रहता] स्वयोनावुपशान्तस्य मनसः सत्यकामिनः । इन्द्रियार्थविमूढस्यानृताः कर्मवशानुगाः ॥११२॥ जो मन सत्यकामी हो चुका है, [सत्य आत्मा के सिवाय जिसे और किसी की कामना ही नहीं रह गयी है इसी कारण] जो अपने कारण में शान्त हो बैठा है इसी लिए शब्दादि विषय की ओर से जिसने अपना मुख मोड़ लिया है [जो बाह्यज्ञान से शून्य हो गया है] ऐसे [संस्कारी] मन की दृष्टि में कर्म के वश से प्राप्त होने वाले [साधनों के अधीन] सुखादि अनृत हो