पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 481, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५९ जाते हैं [उन को यह समझ लिया जाता है कि ये तो मायिक होने से मिथ्या हैं] चित्तमेव हि संसारस्तत् प्रयत्नेन शोधयेत् । यच्चित्तस्तन्मयो मर्त्यो गुह्यमेतत् सनातनम् ॥११३॥ [यद्यपि यह ठीक है कि यह संसार चित्त से नहीं बना है। परन्तु यह संसार भोग्य तो चित्त के कारण से ही बन जाता है इस कारण कहते हैं कि ] चित्त ही संसार है [यह सभी के अनुभव में आने वाली बात है। तभी तो सुषुप्ति आदि के समय जब चित्त का विलय हो जाता है तब भोग नहीं होता] जब कि चित्त ही संसार है तब फिर उस चित्त को [अभ्यास या वैराग्य आदि] प्रयत्न से शुद्ध कर लेना चाहिए। [चित्त के रज और तम हटा कर उसे एकाग्र कर लेना चाहिए। ] जिस देहधारी का चित्त जिस पुत्रादि में पड़ा रहता है वह देह धारी तन्मय ही हुआ रहता है। [उस पुत्रादि की सकलता और विकलता को वह अपने आत्मा में ही आरोपित कर लेता है] यह एक अनादिसिद्धि रहस्य है। भाव यह है कि—आत्मा स्वभाव से शुद्ध है, परन्तु चित्त के संपर्क से ही उस में संसारीपना आ गया है। ऐसी अवस्था में चित्त का शोध करने से ही संसार की निवृत्ति हो सकेगी। चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम् । प्रसन्नात्मात्मनि स्थित्वा सुखमक्षय्यमश्नुते ॥११४॥ जब किसी के चित्त में इतना प्रसाद आ जाता है कि वह ब्रह्मतत्व का अनुसन्धान कर सके तब फिर वह शुभाशुभ सभी कर्मों का क्षय कर डालता है अर्थात् कर्मों में से अहंबुद्धि को