पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 482, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें४६० पञ्चदशी हटा लेता है । [ सरकण्डे की रूई जैसे आग में सहसा भड़ भड़ा उठती है इसी तरह उसके सम्पूर्ण पाप सहसा नष्ट होजाते हैं । ] प्रसन्न चित्त वाला वह, आत्मा [ अर्थात् स्वस्वरूप अद्वि- तीयानन्दरूप ब्रह्म तत्व ] में स्थित होकर, ['वही मैं हूँ' इस निश्चय के कारण सम्पूर्ण दृश्यों को छोड़कर ] चिन्मात्र रूप में स्थिर होकर, अविनाशी जो सुख है [जो कि उसी का स्वरूप है] उसे पा लेता है । शुभ और अशुभ दोनों ही कर्म त्याज्य हैं। पुण्य कर्म से सुख मिलता है। सुख से प्रमाद बढ़ता है। प्रमाद से पापाचरण होता है। पापाचरण से दुःख मिलता है। दुःख से पश्चात्ताप होता है। पश्चात्ताप से पुण्यवासना उत्पन्न होती है। पुण्यवा- सना से फिर पुण्य कर्म होता है। यों यह पुण्य पाप का चक्कर अनन्त काल से घूम रहा है। यों इस चक्कर पर ध्यान रक्खें तो पुण्य भी पाप की तरह ही घातक है। इसीलिए वह भी त्याज्य है। इन दोनों को छोड़ कर अक्षय सुख के मार्ग पर हमें चल पड़ना चाहिए। समासक्तं यथा चित्तं जन्तो र्विषयगोचरे । यद्येवं ब्रह्मणि स्यात् तत् को न मुच्येत बन्धनात्।।११५ प्राणी का चित्त विषय रूपी चरागाह में जैसे स्वभाव से ही रमा रहता है, वही चित्त यदि ब्रह्म में उसी तरह आसक्त हो जाय तो भला कौन इस संसार से मुक्त न हो जाय ? मनो हि द्विविधं प्रोक्तं शुद्धं चाशुद्धमेव च । अशुद्धं कामसंपर्काच्छुद्धं कामविवर्जितम् ॥११६॥ शुद्ध और अशुद्ध यों दो प्रकार का मन होता है। काम