पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 483, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४६१ क्रोधादि के सम्पर्क से तो मन अशुद्ध हो जाता है। कामरहित मन ही शुद्ध मन कहाने लगता है। मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम् ॥११७॥ मन से ही बन्धन और मन से मनुष्यों को मोक्ष मिला करता है। 'विषयासक्त' मन बंधवा देता है। 'निर्विषय' मन मुक्ति दिला देता है। समाधिनिर्धूतमलस्य चेतसो निवेशितस्यात्मनि यत् सुखं भवेत् । न शक्यते वर्णयितुं गिरा तदा स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते ॥११८॥ जिस चित्त को आत्मा में लगा दिया जाता ह, जिस चित्त के रज तम रूपी मल समाधि रूपी जल से धो दिये जाते हैं, उस चित्त को [समाधि में] जो आनन्द आता है, उस आनन्द का वर्णन वाणी से तो किया ही नहीं जा सकता [क्योंकि वह तो एक अलौकिक ही सुख है। वह तो मौन की अलौकिक भाषा में ही समझा और कहा जा सकता है] वह स्वरूपभूत सुख तो केवल अन्तःकरण से ही गृहीत हुआ करता है। यद्यप्यसौ चिरं कालं समाधिदुर्लभो नृणाम् । तथापि क्षणिको ब्रह्मानन्दं निश्चाययत्यसौ ॥११९॥ यद्यपि चिरकाल तक स्थिर रहने वाली ऐसी समाधि मनुष्यों को दुर्लभ होती है, तौ भी क्षणिक भी वह [समाधि] ब्रह्मानन्द का निश्चय तो करा ही देती है।