पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 484, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें४६२ पञ्चदशी श्रद्धालुर्व्यसनी योऽत्र निश्चिनोत्येव सर्वथा । निश्चिते तु सकृत् तस्मिन् विश्वसित्यन्यदाप्ययम्॥१२० जो श्रद्धालु है, जिसे इस बात की धुन लग गई है [ कि इसे तो अब सिद्ध करके ही छोड़ूँगा] वह तो इस समाधि में आनन्द मिलने का निश्चय कर ही लेता है [ उसे लम्बा प्रयास करते करते कभी कभी एकाध क्षण के लिए इस आनन्द की झांकी मिल ही जाती है] क्षणिक समाधि में एक बार जब इस ब्रह्मानन्द का निश्चय उसे हो जाता है तब फिर वह और समय भी आनन्द के होने का विश्वास कर लेता है । तादृक् पुमानुदासीनकाले प्यानन्दवासनाम् । उपेक्ष्य मुख्यमानन्दं भावयत्येव तत्परः ॥१२१॥ श्रद्धादि पूर्वक एक बार भी जिसे निश्चय हो गया है ऐसा मनुष्य, उदासीनता के समय में जो पूर्वोक्त आनन्द वासना आया करती है उसकी भी उपेक्षा कर देता है—उसे भी हटने को कह देता है—और तत्पर होकर मुखानन्द की ही भावना . किया करता है । परव्यसनिनी नारी व्यग्रापि गृहकर्मणि । तदेवास्वादयत्यन्तः परसङ्गरसायनम् ॥१२२॥ एवं तत्वे परे शुद्धे धीरो विश्रान्ति मागतः । तदेवास्वादयत्यन्तः र्बहिर्व्यवहरन्नपि ॥१२३॥ परपुरुष के संभोग का व्यसन जिस नारी को लग जाता है, वह जैसे घर के कामों में व्यग्र सी दीखने पर भी, अन्दर मन में तो उसी परसङ्ग के मजे को चाखती रहती है ॥१२२॥ इसी प्रकार जब कोई धीर पुरुष 'पर' तथा 'शुद्ध' आत्मतत्व