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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

४६२ पञ्चदशी श्रद्धालुर्व्यसनी योऽत्र निश्चिनोत्येव सर्वथा । निश्चिते तु सकृत् तस्मिन् विश्वसित्यन्यदाप्ययम्॥१२० जो श्रद्धालु है, जिसे इस बात की धुन लग गई है [ कि इसे तो अब सिद्ध करके ही छोड़ूँगा] वह तो इस समाधि में आनन्द मिलने का निश्चय कर ही लेता है [ उसे लम्बा प्रयास करते करते कभी कभी एकाध क्षण के लिए इस आनन्द की झांकी मिल ही जाती है] क्षणिक समाधि में एक बार जब इस ब्रह्मानन्द का निश्चय उसे हो जाता है तब फिर वह और समय भी आनन्द के होने का विश्वास कर लेता है । तादृक् पुमानुदासीनकाले प्यानन्दवासनाम् । उपेक्ष्य मुख्यमानन्दं भावयत्येव तत्परः ॥१२१॥ श्रद्धादि पूर्वक एक बार भी जिसे निश्चय हो गया है ऐसा मनुष्य, उदासीनता के समय में जो पूर्वोक्त आनन्द वासना आया करती है उसकी भी उपेक्षा कर देता है—उसे भी हटने को कह देता है—और तत्पर होकर मुखानन्द की ही भावना . किया करता है । परव्यसनिनी नारी व्यग्रापि गृहकर्मणि । तदेवास्वादयत्यन्तः परसङ्गरसायनम् ॥१२२॥ एवं तत्वे परे शुद्धे धीरो विश्रान्ति मागतः । तदेवास्वादयत्यन्तः र्बहिर्व्यवहरन्नपि ॥१२३॥ परपुरुष के संभोग का व्यसन जिस नारी को लग जाता है, वह जैसे घर के कामों में व्यग्र सी दीखने पर भी, अन्दर मन में तो उसी परसङ्ग के मजे को चाखती रहती है ॥१२२॥ इसी प्रकार जब कोई धीर पुरुष 'पर' तथा 'शुद्ध' आत्मतत्व

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४६३

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४६३ में एक बार क्षण भर के लिए भी विश्राम पा लेता है तब फिर वह बाहर लोकव्यवहार करता हुआ भी अन्दर अपने मन में तो उसी आत्मतत्व का आस्वाद लिया करता है। [यों व्यवहार करते हुए भी आत्मसाधन चल सकता है। अर्थात् व्यवहार ज्ञान का विरोधी नहीं है।] धीरत्वमक्षप्राबल्ये ध्यानन्दास्वादवाञ्छया । तिरस्कृत्याखिलाक्षाणि तच्चिन्तायां प्रवर्तनम् ॥१२४॥ [विषयों के सामने आने पर, विषयों की ओर को पुरुष को खींच ले जाने का सामर्थ्य इन्द्रियों में है। यों] इन्द्रियों की प्रबलता होने पर भी आत्मसुख का आस्वाद लेने की उदार इच्छा से, जब सारी इन्द्रियों का तिरस्कार कर दिया जाय, और आत्मानुसन्धान में ही प्रवृत्त हुआ जाय, तब यही 'धीर- पना' कहाता है। भारवाही शिरोभारं मुक्त्वास्ते विश्रमं गतः । संसारव्यावृतित्यागे तादृग्बुद्धिस्तु विश्रमः ॥१२५॥ बोझा उठाने वाला पुरुष थकाने वाले सिर के बोझे को उतार कर जैसे श्रमरहित हो जाता है, इसी प्रकार संसार के व्यापारों का परित्याग कर देने पर, जब किसी-को वैसी ही बुद्धि हो जाय, कि मैं अब श्रमरहित हो गया हूँ—तब बस इसी को 'विश्राम' कहा जाता है। विश्रान्तिं परमां प्राप्त स्तवौदासीन्ये यथा तथा । सुखदुखदशायां च तदानन्दैकतत्परः ॥१२६॥ [जिस परम विश्रान्ति का वर्णन ऊपर किया है वह] परम विश्रान्ति जिस पुरुष को मिल जाती है, वह पुरुष जिस तरह

१६४ पञ्चदशी अपनी उदासीन' अवस्था में लगन के साथ, परमानन्द का स्वाद लेने को उद्यत रहता है, उसी तरह उसका यह स्वभाव हो जाता है कि—फिर वह सुख दुःख प्राप्त होने के समय या सुख दुःख के कारणों के प्राप्त होने के समय में भी [उन सब का विचार छोड़ छोड़ कर] आत्मानन्द का आस्वाद लेने में ही तत्पर रहने लगता है। अग्निप्रवेशहेतौ धीः शृङ्गारे यादृशी तथा। धीरस्योदेति विषयेऽनुसन्धानविरोधििन ॥१२७॥ सती होने वाली स्त्री के लिए जब अग्निप्रवेश का कारण उपस्थित हो जाता है। शीघ्र ही देहत्याग की बलवती दृढ़ इच्छा जब जाग उठती है तब उसको इस त्याग में विघ्न डालने वाले शृङ्गार की कुछ भी परवाह नहीं रहती। ठीक इसी प्रकार वैराग्यादि साधनसम्पन्न विवेकी को, उस विषयसुख की पर- वाह नहीं रहती, जो कि ब्रह्मानुसन्धान का विरोधी होता है। भाव यह है कि विषयसुख, विषयसम्पादन के प्रयत्न में पुरुष को इतना बहिर्मुख बना देता है कि वह पुरुष फिर आत्मा- नुसन्धान कर ही नहीं सकता। इस कारण विवेकी लोगों को वैषयिक सुख की इच्छा ही नहीं होती। भले ही उसको अनुकूल समझ कर संसारी लोग उसके लिए मरते फिरें। जैसे दुःख आत्मविचार का विरोधी होता है वैसे ही विषयसुख भी आत्म- विचार का विरोधी है। अविरोधिसुखे बुद्धिः स्वानन्दे च गमागमौ । कुर्वन्त्यास्ते क्रमादेषा काकाक्षिवदितस्ततः ॥१२८॥ कौवे की आंखों की तरह योगी की बुद्धि कभी तो आत्मा

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४६५

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४६५ नन्द में और कभी आत्मानन्द के अविरोधी सुख में आती जाती रहती है। एकैव दृष्टिः काकस्य वामदक्षिणनेत्रयोः । यात्यायात्येवमानन्दद्वये तत्त्वविदो मतिः ॥१२९॥ जैसे कव्बे की एक ही आंख [पुतली] होती है, वह बायीं और दायीं दोनों आंखों में पर्याय से गमागम करती रहती है। इसी प्रकार विवेकी की बुद्धि भी दोनों आनन्दों में जाती आती रहती है। भुञ्जानो विषयानन्दं ब्रह्मानन्दं च तत्त्ववित् । द्विभाषाभिज्ञवद् विद्यादुभौ लौकिकवैदिकौ ॥१३०॥ 'विषयानन्द' और 'ब्रह्मानन्द' दोनों आनन्दों को एक ही साथ भोगने वाला तत्त्वज्ञानी, दुभाषिये के समान लौकिक और वैदिक दोनों ही तरह के आनन्दों को जाना करता है। जैसे कोई दुभाषिया दोनों से बातचीत करके दोनों के मन की जान लेता हो इसी प्रकार तत्त्वज्ञानी भोग भी करता है और ब्रह्मा- नन्द को भी जानता रहता है। दुःखप्राप्तौ न चोद्वेगो यथापूर्वं यतो द्विदृक् । गङ्गामग्नार्धकायस्य पुंसः शीतोष्णधीर्यथा ॥१३१॥ जिस पुरुष का आधा शरीर गंगा जल में डूब रहा हो और आधे पर सूरज की धूप पड़ रही हो, वह जैसे एक ही समय शीत और उष्ण दोनों का अनुभव करता रहता है, इसी प्रकार दुःखों की प्राप्ति होने पर भी, [पहली अज्ञानदशा की तरह] उसको उद्वेग नहीं होता। क्योंकि वह तो दो दृष्टि वाला होजाता है [विपत्ति के पहाड़ के टूट पड़ने पर भी वह तो वैदिक ब्रह्मा- ३१

४६६ पञ्चदशी नन्द को याद करके आनन्दमग्न हुआ रहता है जिस समय उसे दुःख हो रहा है उसी समय उसे ब्रह्मानन्द भी तो आरहा है वह उस को दुःखी होने नहीं देता] इत्थं जागरणे तत्वविदो ब्रह्मसुखं सदा । भाति,तद्वासनाजन्ये स्वप्ने तद् भासते तथा ॥१३२॥ इस प्रकार जागरण काल में चाहे तो सुखानुभव होता हो, चाहे दुःखानुभव हो रहा हो, और चाहे वे उदासीन होकर चुप चाप बैठे हों, तत्वज्ञानी लोगों को सदा ही ब्रह्मानन्द प्रतीत होता रहता है । केवल जागरण काल में ही नहीं किन्तु जाग्रत् की वासना से उत्पन्न होने वाले सपने में भी जाग्रत् अवस्था की तरह ही उनको ब्रह्मसुख भासा करता है । अविद्यावासनाऽप्यस्तीत्यतस्तद्वासनोत्थिते । स्वप्ने मूर्खवदेवैष सुखं दुःखं च वीक्षते ॥१३३॥ यह तो कहा ही नहीं जासकता कि केवल आनन्दवासना से ही सपने आते हों । सपने तो अविद्यावासना से भी आते हैं । इस कारण जो सपना अविद्या वासना से आता है, उस सपने में ज्ञानी को भी मूर्खों की तरह ही सुखं और दुःख देखने पड़ जाते हैं । ब्रह्मानन्दाभिधे ग्रन्थे ब्रह्मानन्दप्रकाशकम् । योगिप्रत्यक्षमध्याये प्रथमेऽस्मिन्नुदीरितम् ॥१३४॥ ब्रह्मानन्द नाम का जो पांच अध्याय का ग्रन्थ है उस के इस प्रथमाध्याय में, ब्रह्मानन्द को प्रकाशित करने वाले योगी के अनुभव का वर्णन किया गया है ।

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४६७

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४६७ सुषुप्ति अवस्था में,उदासीन काल में, समाधि भावना के समय तथा सुख दुःख की दशा में स्वयंप्रकाश ब्रह्मानन्द को प्रकाशित करने वाला योगी का अनुभव कैसा होता है।] इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितपंचदश्यां ब्रह्मानन्दे योगानन्दो नाम प्रथमोऽध्यायः।

12. Atmananda

ओम् ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् नन्वेवं वासनानन्दाद् ब्रह्मानन्दादपीतरम् । वेत्तु योगी निजानन्दं मूढस्यात्रास्ति का गतिः ॥१॥ [अब ब्रह्मानन्द के अन्तर्गत 'आत्मानन्द' नाम के द्वितीय अध्याय का आरम्भ किया जाता है] शिष्य ने प्रश्न किया कि— वासनानन्द और ब्रह्मानन्द से भिन्न जो आत्मानन्द है उसको योगी लोग तो [इससे पहले योगानन्द नाम के प्रकरण में कहे अनुसार] जान ही सकेंगे। परन्तु इस आत्मानन्द को वे मूढ लोग—जिनकी गति योग में नहीं—कैसे जानें ? धर्माधर्मवशादेष जायतां म्रियतामपि । पुनः पुनर्देहह्रदैः किं नो दाक्षिण्यतो वद ॥२॥ [गुरु ने उत्तर दिया कि] यह अतिमूढ पुरुष तो [बीते हुए अनन्त कोटि जन्मों में किये हुए] पुण्य पापों के बस में आ आकर अनेक प्रकार की लाखों योनियों में जन्मता और मरता रहेगा ही। हमारी चतुराई से क्या होना है ? [ तात्पर्य यह है कि अति मूढ को तो ब्रह्मविद्या का अधिकार ही नहीं है। उसे जीने मरने दो उसकी चिन्ता मत करो।] अस्ति वोऽनुजिघृक्षुत्वाद्दाक्षिण्येन प्रयोजनम् । तर्हि ब्रूहि स मूढः किं जिज्ञासुर्वा पराङ्मुखः ॥३॥ यदि तुम शिष्य लोग अनुजिघृक्षु हो—शिष्यों का उद्धार करने की यदि तुम्हें इच्छा हो और तुम्हारे दाक्षिण्य से उनका

[हेडर] ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४६९

[हेडर] ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४६९ उद्धार रूपी प्रयोजन सिद्ध होता दीख पड़ता हो तो तुम यह बताओ कि वह मूढ [ जिस पर तुम कृपालु हुए हो ] जिज्ञासु है या पराङ्मुख है ? [ उसे संसार से वैराग्य हो गया है या वह अभी संसार में आसक्त हो रहा है ? ] उपास्तिं कर्म वा ब्रूयाद् विमुखाय यथोचितम् । मन्दप्रज्ञं तु जिज्ञासुमात्मानन्देन बोधयेत् ॥४॥ यदि वह तत्वज्ञान से विमुख अर्थात् रागी है तो उसको उसके राग के अनुकूल कर्म या उपासना का यथोचित उपदेश कर देना चाहिए। [ यदि उस मूढ को ब्रह्मलोकादि की कामना है तो उसे उपास्ति बता देनी चाहिए और यदि वह स्वर्ग का मज़ा लूटना चाहता है तो उसे कर्म का मार्ग बताना चाहिए] यदि तो वह मन्दप्रज्ञ जिज्ञासु है तो उसे आत्मानन्द से समझाना चाहिए । [ उसके सामने आत्मानन्द की विवेचना करनी चाहिए और उसे अज्ञाननिद्रा से जगा लेना चाहिए] बोधयामास मैत्रेयीं याज्ञवल्क्यो निजप्रियाम् । न वा अरे पत्युरर्थे पतिः प्रिय इतीरयन् ॥५॥ याज्ञवल्क्य नाम के ऋषि ने मैत्रेयी नाम की अपनी पत्नी को 'अरे पत्नी को पति के लिए पति प्रिय नहीं होता' इत्यादि शब्दों से इसी आत्मानन्द की विवेचना करते करते आत्म बोध करा दिया था । पतिर्जाया पुत्रवित्ते पशुब्राह्मणबाहुजाः । लोका देवा वेदभूते सर्वं चात्मार्थतः प्रियम् ॥६॥ पति, पत्नी, पुत्र, वित्त, पशु, ब्राह्मण, क्षत्रिय, लोक, देव,

[Header] ४७० पञ्चदशी [Decorative divider]

वेद तथा भूत, ये सभी कुछ भोक्ता आत्मा के लिए होने से ही प्यारे हो जाते हैं [इन में से एक भी पदार्थ स्वरूप से प्यारा नहीं होता] पत्याविच्छा यदा पत्न्यास्तदा प्रीतिं करोति सा । क्षुदनुष्ठानरोगाद्यै स्तदा नेच्छति तत्पतिः ॥७॥ जब पत्नी को पति की इच्छा होती है, तभी वह पति से प्रेम करती है। परन्तु उसका पति भूख में, किसी अनुष्ठान में या किसी रोगादि में, फंसा होता है, तो वह उस पत्नी को नहीं चाहता [इस कथन से यह समझलो कि पत्नी का प्रेम इकतरफ़ा प्रेम है। यह प्रेम अकेली पत्नी का ही स्वार्थ है] न पत्युरर्थे सा प्रीतिः स्वार्थ एव करोति ताम् । पतिश्चात्मन एवार्थे न जायार्थे कदाचन ॥८॥ पत्नी का वह प्रेम पति के लिए नहीं होता। किन्तु वह पत्नी उस प्रेम को तो अपने लिए ही करती है। उधर पति की भी यही अवस्था है। वह भी अपने मतलब से ही पत्नी से प्रेम किया करता है। वह भी पत्नी के लिए पत्नी से प्रेम कभी नहीं करता। अन्योन्यप्रेरणेप्येवं स्वेच्छयैव प्रवर्तनम् ॥६॥ जब तो दोनों की इच्छा से दोनों एक साथ ही प्रवृत्त होते हैं [तब भी प्रीति को उभयार्थ न मानना चाहिए क्योंकि] तब भी तो वे दोनों [इसी प्रकार अपनी अपनी कामना को पूरा करने की] अपनी अपनी इच्छा से ही प्रवृत्त हुआ करते हैं। [पत्नी अपनी इच्छा से पति को प्रेरणा करती है और पति अपनी इच्छा से पत्नी को प्रेरणा किया करता है।]

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४७१

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४७१

श्मश्रुकण्टकवेधेन बाले रुदति तत्पिता । चुम्बत्येव न सा प्रीति र्बालार्थे स्वार्थ एव सा ॥१०॥ [दृष्टान्त में भी देख लो कि—अपनी एकपक्षीय (एकतर्फ़ा) इच्छा से ही प्रवृत्ति होती है] दाढ़ी मूँछ के काँटे जब चुभते हैं और बालक रोता है तब भी उसका पिता उस बालक को चूमता ही जाता है । क्या पिता के इस प्रेम को बच्चे की प्रीति के लिए ही कहोगे ? पिता का यह प्रेम तो अपनी तुष्टि के लिए ही होता है । निरिच्छमपि रत्नादिवित्तं यत्नेन पालयन् । प्रीतिं करोति सा स्वार्थे वित्तार्थत्वं न शङ्कितम् ॥११॥ [जो पति पत्नी तथा पुत्रादि चेतन पदार्थ हैं, उनकी प्रीति में स्वार्थ परार्थ का सन्देह हो भी जाता हो, परन्तु जो पदार्थ अचेतन होने के कारण कुछ इच्छा ही नहीं करते, उन पदार्थों से जब हम प्रीति करते हैं, तब तो परार्थता की शंका ही नहीं रह जाती] देखो, इच्छा से हीन रत्न आदि धन को यत्न से पालता हुआ धनी, जब उस वित्त पर प्रेम करता है तब उस धनी का वह प्रेम स्वार्थमूलक ही होता है । धनी का वह प्रेम धन के लिए किया हुआ प्रेम है ऐसी शंका कोई नहीं करता । अनिच्छति बलीवर्दे विवाहयिषते बलात् । प्रीतिः सा वणिगर्थैव बलीवर्दार्थता कुतः ॥१२॥ बैल तो बोझ को ढोना नहीं चाहता, परन्तु व्यौपारी उससे ज़बरदस्ती बोझ ढुआना चाहता है । बोझ ढोने के लिए रक्खे हुए उस बैल पर जो वणिक् का प्रेम होता है वह तो वणिक् के ही लिए होता है । वह प्रेम बैल के लिए कैसे हो जायगा ?

४७२ पञ्चदशी

ब्राह्मण्यं मेऽस्ति पूज्योऽहमिति तुष्यति पूजया । अचेतनाया जातेर्नो सन्तुष्टिः पुंस एव सा ॥१३॥ 'मैं ब्राह्मण हूँ इसी से मैं पूजनीय हूँ' इस प्रकार ब्राह्मण्य- निमित्तक पूजा से जो सन्तोष होता है, वह सन्तोष अचेतन ब्राह्मण जाति को नहीं होता। वह सन्तोष तो [ ब्राह्मणपन के अभिमानी ] पुरुष को ही होता है। क्षत्रियोऽहं तेन राज्यं करोमीत्यत्र राजता । न जाते, वैश्यजात्यादौ योजनायेदमीरितम् ॥१४॥ 'मैं क्षत्रिय हूँ, इसी से मैं राज करता हूँ' इसमें जो राज्य भोग के कारण सुख होता है, वह क्षत्रियत्व जाति वाले पुरुष को ही होता है। क्षत्रियत्व जाति को उसका कुछ भी सुख नहीं होता [क्योंकि जाति तो जडपदार्थ है] वैश्यादि जातियों में भी इसी प्रकार समझने के लिए उपलक्षण रूप में इनका नाम लिया है। उनमें भी यही बात समझनी चाहिए। स्वर्गलोकब्रह्मलोकौ स्तां ममेत्यभिवाञ्छनम् । लोकयोर्नोपकाराय, स्वभोगायैव केवलम् ॥१५॥ [कर्म और उपासना से] 'स्वर्ग या ब्रह्मलोकादि मुझे प्राप्त हो जाय' यह जो वाञ्छा प्राणी को होती है, यह लोकों की भलाई के लिए नहीं होती। यह तो केवल अपने भोग के लिए होती है। ईशविष्ण्वादयो देवाः पूज्यन्ते पापनष्टये । न तन्निष्पापदेवार्थं, तत्तु स्वार्थं प्रयुज्यते ॥१६॥ पाप की निवृत्ति के लिए जो ईश या विष्णु आदि देवता

ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४७३

ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४७३ पूजे जाते हैं, वह पूजा उन निष्पाप देवताओं के लिए नहीं होती। किन्तु वह पूजा तो पूजक के लिए ही की जाती है [यों अपने स्वार्थ के लिए ही ईश्वर पूजा की जाती है। ईश्वर का तो उसमें कुछ भी स्वार्थ नहीं होता।] ऋगादयो ह्यधीयन्ते दुर्ब्राह्मण्यानवाप्तये । न तत् प्रसक्तं वेदेषु मनुष्येषु प्रसज्जते ॥१७॥ व्रात्यपन से बचने के लिए ऋगादि वेदों का अध्ययन किया जाता है। वेदों में तो उस व्रात्यपन की संभावना भी नहीं होती। वह तो मनुष्यों में ही प्रसक्त होता है [यों अपने स्वार्थ के लिए ही वेदाध्ययन किया जाता है।] भूम्यादिपञ्चभूतानि स्थानतृट्पाकशोषणैः । हेतुभिश्चावकाशेन वाञ्छन्त्येषां न हेतवः ॥१८॥ सारे प्राणी किसी वस्तु को रखने के लिए भूमि को, प्यास निवारण करने के लिए जल को, पाक और शोषण करने के लिए अग्नि और वायु को तथा अवकाशदान करने के कारण आकाश को चाहते हैं। इन पृथिवी आदि भूतों को तो स्थान आदि की कुछ आवश्यकता ही नहीं होती है। स्वामिभृत्यादिकं सर्वं स्वोपकाशाय वाञ्छति । तत्तत्कृतोपकारस्तु तस्य तस्य न विद्यते ॥१९॥ स्वामी जो भृत्य को चाहता है, भृत्य जो स्वामी को चाहता है, सो सब अपने अपने उपकार के लिए ही तो चाहता है। दूसरों का किया हुआ उपकार दूसरों को नहीं मिलता। कोई भी किसी दूसरे की भलाई करना नहीं चाहता सभी संसार स्वार्थी है। दुनिया के परोपकारी कहलाने वाले लोग

४७४ पञ्चदशी

भी स्वार्थी ही हैं। वे जब किसी को दुःखी देखते हैं तब उनके जी में एक कांटा सा चुभा करता है। हृदय में चुभने वाले अपने उस कांटे को निकालने के लिए ही वे परोपकार में प्रवृत्त होते हैं। परोपकार किये बिना उनके जी का कांटा निकलता ही नहीं। यों परोपकारी लोग भी अन्ततः सच्चे स्वार्थी ही हैं। सर्वव्यवहृतिष्वेवमनुसन्धायमीदृशम् । उदाहरणबाहुल्यं, तेन स्वां वासयेन्मतिम् ॥२०॥ [यों इच्छापूर्वक जितने भी व्यवहार होते हैं उन] सब व्यवहारों में इसी प्रकार आत्मप्रीति को दिखाने के लिए पति पत्नी आदि बहुत से उदाहरण दिये हैं। इस कारण समझदार को आत्ममति की वासना कर लेनी [आत्मविषयक बुद्धि बना लेनी] चाहिए [सब पदार्थों को आत्मा का उपकारी समझ कर, आत्मा को ही सब से अधिक प्रिय जान लेना चाहिए।] अथ केयं भवेत् प्रीतिः श्रूयते या निजात्मनि । रागो वध्वादिविषये, श्रद्धा यागादिकर्मणि । भक्तिःस्याद् गुरुदेवादाविच्छा त्वप्राप्तवस्तुनि ॥२१॥ अब प्रश्न यह है कि—यह जो निजात्मा में प्रीति सुनी जाती है। उस प्रीति का रूप क्या है ? क्या वह राग है ? श्रद्धा है ? भक्ति है ? या इच्छा है ? यदि वह राग हो तो वधू आदि में ही हो। यदि वह श्रद्धा हो तो वह यागादि में ही हो। यदि वह भक्ति हो तो वह गुरु आदि में ही हो। यदि वह इच्छा हो तो वह अप्राप्त वस्तु ही में हो। [आत्मा का शेष (अंग) होने से सब पदार्थ प्रिय होते हैं और आत्मा प्रियतम होता है। प्रेम के स्वरूप को जाने बिना आत्मा की प्रियतमता

: समझ में आती ही नहीं। इस कारण प्रेम के स्वरूप की विवे- : चना इस श्लोक में सूझी है। प्रेम ऐसा होना चाहिए जो सभी : पदार्थों पर लागू हो सकता हो। यदि वह सब पदार्थों पर लागू : नहीं होता है तो वह प्रेम नहीं है। उसको सर्वविषयक सिद्ध : करने के लिए प्रीति का रूप बताना चाहिए जो सब में : पाया जा सकता हो।] : तर्ह्यस्तु सात्त्विकी वृत्तिः सुखमात्रानुवर्तिनी । : प्राप्ते, नष्टेऽपि, सद्भावादिच्छातो व्यतिरिच्यते ॥२२॥ : उसका उत्तर यह है कि यदि वह प्रीति रागादिरूप नहीं : हो सकती है तो आप उस प्रीति को केवल सुख को विषय : करने वाली एक सात्त्विक वृत्ति मान लो। उस प्रीति को सत्त्व- : गुण से बनी हुई अन्तःकरण की वृत्ति समझ लो। जब कोई : वस्तु प्राप्त हुई रहती है या जब कोई वस्तु प्राप्त होकर नष्ट हो : जाती है अथवा अप्राप्त रहती है तब भी उसके विषय में यह : [केवल सुख को विषय करने वाली सात्त्विक] वृत्ति बनी ही : रहती है। इस कारण इस वृत्ति को इच्छा से भिन्न माना जाता : है। [क्योंकि इच्छा तो केवल अप्राप्त सुखादि को ही अपना : विषय बनाया करती है और यह वृत्ति प्राप्त अप्राप्त सभी को : अपना विषय बनाती है] : सुखसाधनतोपाधेरन्नपानादयः प्रियाः ॥२३॥ : आत्मानुकूल्यादन्नादिसमश्चेदमुनात्रकः । : अनुकूलयितव्यः स्यान्नैकस्मिन् कर्मकर्तृता ॥२४॥ : प्रश्न होता है कि--सुख के साधन होने के कारण जैसे : अन्न पानादि प्रिय देखे गए हैं इसी प्रकार यदि यह आत्मा भी

[header] ४७६ पञ्चदशी .


अनुकूल किंवा प्रिय होने के कारण ही [अन्नपानादि के समान] सुख का साधन होता होगा,तो इसका क्या समाधान करते हो ? इस का उत्तर यह है कि—अच्छा यह बताओ कि तुम्हें इस आत्मा से किस की अनुकूलता करनी है ? [ऐसा तो कोई दीख नहीं पड़ता कि इस आत्मा को जिस के अनुकूल बना दिया जाता हो। आत्मा से भिन्न तो कोई और भोक्ता है ही नहीं। यदि कहो कि वह स्वयं अपने आप के ही अनुकूल हो जायगा तो हम कहेंगे कि] एक में कर्म और कर्ता की दोनों बात नहीं रह सकतीं। [वही आत्मा उपकार्य भी हो और वही उपकारक भी हो, यह दोनों विरुद्ध धर्म एक आत्मा में कैसे टिकेंगे ? ] सुखे वैषयिके प्रीतिमात्रमात्मा त्वतिप्रियः । सुखे व्यभिचरत्येषा नात्मनि व्यभिचारिणी ॥२५॥ विषयजन्य जो सुख है, उनमें प्रीति तो होती है [किन्तु उनमें प्रगाढ प्रीति नहीं होती] इसके विपरीत आत्मा तो अत्यन्त प्रिय होता है [इस कारण उसे विषयजन्य सुखों के समान मत मानो। जैसे विषयसुख भोक्ता के काम आता है, वैसे यह आत्मा किसी भोक्ता के उपयोग में आने वाला तत्व नहीं है ] देख लो कि विषय सुखों में रहने वाली यह प्रीति व्यभि- चार कर जाती है—[यह प्रीति कभी पूर्वसुखों को छोड़ कर दूसरे सुखों में पहुँच जाती है—एक सुख में बँध कर बैठे रहना इस प्रीति को पसन्द नहीं है] परन्तु आत्मा में जो प्रीति रहती है वह कभी व्यभिचार नहीं करती—[वह विषयान्तर में कभी नहीं जाती। इस कारण आत्मप्रीति को ही निरतिशय प्रीति कह सकते हैं।]

ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ५७७

ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ५७७ एकं त्यक्त्वान्यदादत्त सुखं वैषयिकं सदा। नात्मा त्याज्यो न चादेयस्तस्मिन् व्यभिचरेत् कथम् ॥२६॥ वैषयिक सुखों की तो यह आदत है कि वे सदा एक को छोड़ कर दूसरे से नेह जोड़ लेते हैं। छोड़ने और ग्रहण करने के अयोग्य होने के कारण आत्मा तो छोड़ा या ग्रहण किया ही नहीं जा सकता। फिर यह प्रीति उसमें व्यभिचार कैसे कर सकेगी ? हानादानविहीनेऽस्मिन्नुपेक्षा चेत् तृणादिवत् । उपेक्षितुः स्वरूपत्वान्नोपेक्ष्यत्वं निजात्मनः ॥२७॥ परत्याग करना और स्वीकार कर लेना, ये दोनों ही जिस आत्मा में नहीं बन सकते, यदि उस आत्मा को तृण आदि तुच्छ पदार्थों की तरह उपेक्षा करना चाहो, तो भी अयोग्य होने के कारण उसकी उपेक्षा नहीं हो सकती । क्योंकि जिस आत्मा की उपेक्षा करनी है वह तो उस उपेक्षा करने वाले का स्वरूप ही है [जो निजात्मा अर्थात् अपना अविनाशी स्वरूप है, स्वरूप होने के कारण ही वह अपने से भिन्न तृणादि विषय के समान, उपेक्षा का विषय ही नहीं हो सकता ।] रोगक्रोधाभिभूतानां मुमूर्षा वीक्ष्यते क्वचित् । ततो द्वेषाद् भवेत् त्याज्य आत्मेति यदि तन्न हि ॥२८॥ जब कोई दारुण रोग, या दारुण क्रोध किसी पर आक्र- मण करता है तब वह मर जाना चाहता है। इस दृष्टान्त को लेकर आत्मा में द्वेष की संभावना हो जाती है और सांप बिच्छू के समान यह आत्मा भी द्वेष के कारण त्याज्य हो जाता है ऐसी शंका का करना ठीक नहीं है

४७८ पञ्चदशी आत्मा से भिन्न देह का ही हो सकता है। आत्मा का त्याग कभी हो ही नहीं सकता।] त्यक्तुं योग्यस्य देहस्य नात्मता त्यक्तुरेव सा । न त्यक्तर्य्यस्ति स द्वेष स्त्याज्ये द्वेषे तु का क्षतिः ॥२६॥ देख लो कि जो देह त्याग करने के योग्य है, वह तो आत्मा ही नहीं है। देह का त्याग करने वाला, देह से भिन्न जो जीव है, उसी को 'आत्मा' कहते हैं। प्रकृत तात्पर्य तो यही है कि— वह द्वेष त्याग करने वाले आत्मा से नहीं हो सकता। यदि किसी को त्याज्य देहादि पदार्थों में द्वेष हो तो उससे मेरे सिद्धान्त में क्या हानि होगी? [जो मैं यह मान रहा हूँ कि आत्मा का त्याग नहीं हो सकता, उस मेरे मत में त्याज्य देहों में किसी रोगी या किसी क्रोधी को द्वेष हो भी तो उससे मेरे सिद्धान्त की क्षति नहीं होती।] आत्मार्थत्वेन सर्वस्य प्रीतेश्चात्मा ह्यतिप्रियः । सिद्धो, यथा पुत्रमित्रात् पुत्रः प्रियतरस्तथा ॥३०॥ [सुख और सुख के साधन पति-पत्नी आदि] सभी कुछ जब आत्मार्थ हो जाते हैं [जब ये सब अपने उपकारक हो जाते हैं] तभी प्रिय होते हैं, इस कारण से भी आत्मा ही अत्यन्तप्रिय माना जाता है। लोक में भी देखा जाता है कि—पुत्र के मित्र से [जिस पर कि हमारा प्रेम पुत्र के द्वारा होता] पुत्र ही [व्यव- धानरहित प्रेम का पात्र होने के कारण] पिता को अधिक प्यारा लगता है [इसी प्रकार जो सब पदार्थ अपने सम्बन्धी होने के कारण प्रेम के पात्र बन गये हैं उन सब पदार्थों की अपेक्षा वह आत्मा अधिक प्यारा होता है]

ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४७९

ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४७९ मा न भूवमहं किन्तु भूयासं सर्वदेत्यसौ । आशीः सर्वस्य दृष्टेति प्रत्यक्षा प्रीतिरात्मनि ॥३१॥ अपने अनुभव से भी पूछ लो कि—'मेरा कभी भी असत्त्व न हो । किन्तु मैं सदा ही बना रहूँ' ऐसी प्रार्थना सभी प्राणी करते पाये जाते हैं। जब कि सभी ऐसी प्रार्थना करते हैं तब आत्मा में प्रत्यक्ष ही निरतिशय प्रीति सिद्ध हो जाती है । इत्यादिभिस्त्रिभिः प्रीतौ सिद्धायामेवमात्मनि । पुत्रभार्यादिशेषत्वमात्मनः कैश्चिदीरितम् ॥३२॥ यों अनुभव युक्ति और श्रुति इन तीनों प्रमाणों से प्रथम कही हुई रीति से, यद्यपि आत्मा में निरतिशय प्रेम सिद्ध हो चुका है, तो भी श्रुत्यादि के रहस्यों को न समझने वाले कोई कोई पुरुष आत्मा को भी पुत्रभार्यादि का शेष किंवा उपकारक कहते हैं । एतद्विवक्षया पुत्रे मुख्यात्मत्वं श्रुतीरितम् । आत्मा वै पुत्रनामेति तच्चोपनिषदि स्फुटम् ॥३३॥ वे कहते हैं कि—'आत्मा वै पुत्रनामासि' इत्यादि श्रुति में इसी भाव से पुत्र को मुख्य आत्मा कहा है । पुत्र के मुख्य आत्मा होने की बात ऐतरेय आदि उपनिषदों में भी स्पष्ट कही गयी है । सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः कर्मेभ्यः प्रतिधीयते । अथास्येतर आत्मायं कृतकृत्यः प्रमीयते ॥३४॥ उनमें कहा गया है कि—इस पिता का यही वह पुत्ररूप आत्मा [जो पुरुष के देह में गर्भरूप से रहता है, जिसको बड़े प्रेम से पालनीय कहा जाता है] पुण्य कर्मों के करने के लिए, अपना प्रतिनिधि बना कर, छोड़ा जाता है । उसके पश्चात् इस

४८० पञ्चदशी पिता का यह पितृरूप आत्मा अपने आप तो कृतकृत्य होकर मर जाता है। सत्यप्यात्मनि लोकोस्ति नापुत्रस्यात एव हि। अनुशिष्टं पुत्रमेव लोक्यमाहुर्मनीषिणः ॥३५॥ 'नापुत्रस्य लोकोस्ति' इस वाक्य में कहा गया है कि— आत्मा के होने पर भी अगर पुत्र नहीं है, तो पिता को पर- लोक नहीं मिलता। मनीषी लोग शिक्षित पुत्र को ही लोक्य [अर्थात् परलोक का साधन] बताते हैं। मनुष्यलोको जय्यः स्यात् पुत्रेणैवेतरेण नो। मुमूर्षुमंन्त्रयेत् पुत्रं त्वं ब्रह्मेत्यादिमन्त्रकैः ॥३६॥ 'सोयं मनुष्यलोकः पुत्रेणैव जय्यो नान्येन कर्मणा' (बृ० १-५-१६) इस वाक्य में कहा गया है कि मनुष्यलोक का सुख तो केवल पुत्र स हो सम्पादित हो सकता है। कर्म आदि दूसरे किसी साधन से मनुष्यलोक के सुख का उपार्जन नहीं हो सकता। [देखते हैं कि जिसके पुत्र नहीं होता उसको सुख के साधन धन सम्पत्ति को देख देख कर भी निर्वेदं हुआ करता है] मुमूर्षु पिता को चाहिए कि मरते समय 'त्वं ब्रह्म' इत्यादि तीन मन्त्रों के द्वारा पुत्र का अनुशासन करे। इत्यादिश्रुतयः प्राहुः पुत्रभार्यादिशेषताम् । लौकिका अपि पुत्रस्य प्राधान्यमनुमन्वते ॥३७॥ इत्यादि पूर्वोक्त श्रुतियों ने आत्मा को पुत्र भार्या आदि का शेष कहा है। इसके अतिरिक्त लौकिक लोग भी पुत्र की प्रधा- नता को मानते ही हैं।

ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८१

ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८१

स्वस्मिन् मृतेऽपि पुत्रादिर्जीवेद् वित्तादिना यथा । तथैव यत्नं कुरुते मुख्याः पुत्रादयस्ततः ॥३८॥ देखा जाता है कि-अपने मर जाने पर भी पुत्र पत्नी आदि, क्षेत्र आदि सम्पत्ति के द्वारा जैसे जीते रहें, वैसा यत्न यह प्राणी किया करता है। इससे यही सिद्ध होता है कि- पुत्र भार्या आदि ही मुख्य हैं [क्योंकि अपना प्रयास सह सह- कर भी पुत्रादि के जीवन का उपाय किया जाता है, इसी से समझते हैं कि पुत्रादि ही प्रधान हैं।] बाढमेतावता नात्मा शेषो भवति कस्यचित् । गौणमिथ्यामुख्यभेदैरात्मायं भवति त्रिधा ॥३९॥ इसका समाधान यह है कि-उक्त रीति से कहीं कहीं पुत्रादि मुख्य तो होते हैं। परन्तु केवल इतनी सी बात से यह आत्मा किसी का शेष नहीं बन जाता। गौण, मिथ्या तथा मुख्य ये तीन भेद आत्मा के होते हैं। [सो जिस जिस व्यव- हार में, जिस जिस तरह की आत्मता विवक्षित होती है, उस-उस व्यवहार में उस-उस आत्मा की प्रधानता मानी जाती है।] देवदत्तस्तु सिंहोऽयमित्यैक्यं गौणमेतयोः । भेदस्य भासमानत्वात् पुत्रादेरात्मता तथा ॥४०॥ 'यह देवदत्त तो शेर है' ऐसा जब कोई कहता है तब शेर तथा देवदत्त इन दोनों की जो एकता भासती है वह गौण है। क्योंकि इन दोनों का भेद तो प्रत्यक्ष ही प्रतीत होता रहता है। इसी प्रकार भेद के प्रत्यक्ष प्रतीत होते रहने के कारण पुत्रादि भी गौण आत्मा माने जा सकते हैं। [ मुख्य नहीं ]