भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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४७४ पञ्चदशी

भी स्वार्थी ही हैं। वे जब किसी को दुःखी देखते हैं तब उनके जी में एक कांटा सा चुभा करता है। हृदय में चुभने वाले अपने उस कांटे को निकालने के लिए ही वे परोपकार में प्रवृत्त होते हैं। परोपकार किये बिना उनके जी का कांटा निकलता ही नहीं। यों परोपकारी लोग भी अन्ततः सच्चे स्वार्थी ही हैं। सर्वव्यवहृतिष्वेवमनुसन्धायमीदृशम् । उदाहरणबाहुल्यं, तेन स्वां वासयेन्मतिम् ॥२०॥ [यों इच्छापूर्वक जितने भी व्यवहार होते हैं उन] सब व्यवहारों में इसी प्रकार आत्मप्रीति को दिखाने के लिए पति पत्नी आदि बहुत से उदाहरण दिये हैं। इस कारण समझदार को आत्ममति की वासना कर लेनी [आत्मविषयक बुद्धि बना लेनी] चाहिए [सब पदार्थों को आत्मा का उपकारी समझ कर, आत्मा को ही सब से अधिक प्रिय जान लेना चाहिए।] अथ केयं भवेत् प्रीतिः श्रूयते या निजात्मनि । रागो वध्वादिविषये, श्रद्धा यागादिकर्मणि । भक्तिःस्याद् गुरुदेवादाविच्छा त्वप्राप्तवस्तुनि ॥२१॥ अब प्रश्न यह है कि—यह जो निजात्मा में प्रीति सुनी जाती है। उस प्रीति का रूप क्या है ? क्या वह राग है ? श्रद्धा है ? भक्ति है ? या इच्छा है ? यदि वह राग हो तो वधू आदि में ही हो। यदि वह श्रद्धा हो तो वह यागादि में ही हो। यदि वह भक्ति हो तो वह गुरु आदि में ही हो। यदि वह इच्छा हो तो वह अप्राप्त वस्तु ही में हो। [आत्मा का शेष (अंग) होने से सब पदार्थ प्रिय होते हैं और आत्मा प्रियतम होता है। प्रेम के स्वरूप को जाने बिना आत्मा की प्रियतमता