भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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: समझ में आती ही नहीं। इस कारण प्रेम के स्वरूप की विवे- : चना इस श्लोक में सूझी है। प्रेम ऐसा होना चाहिए जो सभी : पदार्थों पर लागू हो सकता हो। यदि वह सब पदार्थों पर लागू : नहीं होता है तो वह प्रेम नहीं है। उसको सर्वविषयक सिद्ध : करने के लिए प्रीति का रूप बताना चाहिए जो सब में : पाया जा सकता हो।] : तर्ह्यस्तु सात्त्विकी वृत्तिः सुखमात्रानुवर्तिनी । : प्राप्ते, नष्टेऽपि, सद्भावादिच्छातो व्यतिरिच्यते ॥२२॥ : उसका उत्तर यह है कि यदि वह प्रीति रागादिरूप नहीं : हो सकती है तो आप उस प्रीति को केवल सुख को विषय : करने वाली एक सात्त्विक वृत्ति मान लो। उस प्रीति को सत्त्व- : गुण से बनी हुई अन्तःकरण की वृत्ति समझ लो। जब कोई : वस्तु प्राप्त हुई रहती है या जब कोई वस्तु प्राप्त होकर नष्ट हो : जाती है अथवा अप्राप्त रहती है तब भी उसके विषय में यह : [केवल सुख को विषय करने वाली सात्त्विक] वृत्ति बनी ही : रहती है। इस कारण इस वृत्ति को इच्छा से भिन्न माना जाता : है। [क्योंकि इच्छा तो केवल अप्राप्त सुखादि को ही अपना : विषय बनाया करती है और यह वृत्ति प्राप्त अप्राप्त सभी को : अपना विषय बनाती है] : सुखसाधनतोपाधेरन्नपानादयः प्रियाः ॥२३॥ : आत्मानुकूल्यादन्नादिसमश्चेदमुनात्रकः । : अनुकूलयितव्यः स्यान्नैकस्मिन् कर्मकर्तृता ॥२४॥ : प्रश्न होता है कि--सुख के साधन होने के कारण जैसे : अन्न पानादि प्रिय देखे गए हैं इसी प्रकार यदि यह आत्मा भी