पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 500, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें४७८ पञ्चदशी आत्मा से भिन्न देह का ही हो सकता है। आत्मा का त्याग कभी हो ही नहीं सकता।] त्यक्तुं योग्यस्य देहस्य नात्मता त्यक्तुरेव सा । न त्यक्तर्य्यस्ति स द्वेष स्त्याज्ये द्वेषे तु का क्षतिः ॥२६॥ देख लो कि जो देह त्याग करने के योग्य है, वह तो आत्मा ही नहीं है। देह का त्याग करने वाला, देह से भिन्न जो जीव है, उसी को 'आत्मा' कहते हैं। प्रकृत तात्पर्य तो यही है कि— वह द्वेष त्याग करने वाले आत्मा से नहीं हो सकता। यदि किसी को त्याज्य देहादि पदार्थों में द्वेष हो तो उससे मेरे सिद्धान्त में क्या हानि होगी? [जो मैं यह मान रहा हूँ कि आत्मा का त्याग नहीं हो सकता, उस मेरे मत में त्याज्य देहों में किसी रोगी या किसी क्रोधी को द्वेष हो भी तो उससे मेरे सिद्धान्त की क्षति नहीं होती।] आत्मार्थत्वेन सर्वस्य प्रीतेश्चात्मा ह्यतिप्रियः । सिद्धो, यथा पुत्रमित्रात् पुत्रः प्रियतरस्तथा ॥३०॥ [सुख और सुख के साधन पति-पत्नी आदि] सभी कुछ जब आत्मार्थ हो जाते हैं [जब ये सब अपने उपकारक हो जाते हैं] तभी प्रिय होते हैं, इस कारण से भी आत्मा ही अत्यन्तप्रिय माना जाता है। लोक में भी देखा जाता है कि—पुत्र के मित्र से [जिस पर कि हमारा प्रेम पुत्र के द्वारा होता] पुत्र ही [व्यव- धानरहित प्रेम का पात्र होने के कारण] पिता को अधिक प्यारा लगता है [इसी प्रकार जो सब पदार्थ अपने सम्बन्धी होने के कारण प्रेम के पात्र बन गये हैं उन सब पदार्थों की अपेक्षा वह आत्मा अधिक प्यारा होता है]