पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ५७७ एकं त्यक्त्वान्यदादत्त सुखं वैषयिकं सदा। नात्मा त्याज्यो न चादेयस्तस्मिन् व्यभिचरेत् कथम् ॥२६॥ वैषयिक सुखों की तो यह आदत है कि वे सदा एक को छोड़ कर दूसरे से नेह जोड़ लेते हैं। छोड़ने और ग्रहण करने के अयोग्य होने के कारण आत्मा तो छोड़ा या ग्रहण किया ही नहीं जा सकता। फिर यह प्रीति उसमें व्यभिचार कैसे कर सकेगी ? हानादानविहीनेऽस्मिन्नुपेक्षा चेत् तृणादिवत् । उपेक्षितुः स्वरूपत्वान्नोपेक्ष्यत्वं निजात्मनः ॥२७॥ परत्याग करना और स्वीकार कर लेना, ये दोनों ही जिस आत्मा में नहीं बन सकते, यदि उस आत्मा को तृण आदि तुच्छ पदार्थों की तरह उपेक्षा करना चाहो, तो भी अयोग्य होने के कारण उसकी उपेक्षा नहीं हो सकती । क्योंकि जिस आत्मा की उपेक्षा करनी है वह तो उस उपेक्षा करने वाले का स्वरूप ही है [जो निजात्मा अर्थात् अपना अविनाशी स्वरूप है, स्वरूप होने के कारण ही वह अपने से भिन्न तृणादि विषय के समान, उपेक्षा का विषय ही नहीं हो सकता ।] रोगक्रोधाभिभूतानां मुमूर्षा वीक्ष्यते क्वचित् । ततो द्वेषाद् भवेत् त्याज्य आत्मेति यदि तन्न हि ॥२८॥ जब कोई दारुण रोग, या दारुण क्रोध किसी पर आक्र- मण करता है तब वह मर जाना चाहता है। इस दृष्टान्त को लेकर आत्मा में द्वेष की संभावना हो जाती है और सांप बिच्छू के समान यह आत्मा भी द्वेष के कारण त्याज्य हो जाता है ऐसी शंका का करना ठीक नहीं है