भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 487, कुल 726 में से

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ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४६५ नन्द में और कभी आत्मानन्द के अविरोधी सुख में आती जाती रहती है। एकैव दृष्टिः काकस्य वामदक्षिणनेत्रयोः । यात्यायात्येवमानन्दद्वये तत्त्वविदो मतिः ॥१२९॥ जैसे कव्बे की एक ही आंख [पुतली] होती है, वह बायीं और दायीं दोनों आंखों में पर्याय से गमागम करती रहती है। इसी प्रकार विवेकी की बुद्धि भी दोनों आनन्दों में जाती आती रहती है। भुञ्जानो विषयानन्दं ब्रह्मानन्दं च तत्त्ववित् । द्विभाषाभिज्ञवद् विद्यादुभौ लौकिकवैदिकौ ॥१३०॥ 'विषयानन्द' और 'ब्रह्मानन्द' दोनों आनन्दों को एक ही साथ भोगने वाला तत्त्वज्ञानी, दुभाषिये के समान लौकिक और वैदिक दोनों ही तरह के आनन्दों को जाना करता है। जैसे कोई दुभाषिया दोनों से बातचीत करके दोनों के मन की जान लेता हो इसी प्रकार तत्त्वज्ञानी भोग भी करता है और ब्रह्मा- नन्द को भी जानता रहता है। दुःखप्राप्तौ न चोद्वेगो यथापूर्वं यतो द्विदृक् । गङ्गामग्नार्धकायस्य पुंसः शीतोष्णधीर्यथा ॥१३१॥ जिस पुरुष का आधा शरीर गंगा जल में डूब रहा हो और आधे पर सूरज की धूप पड़ रही हो, वह जैसे एक ही समय शीत और उष्ण दोनों का अनुभव करता रहता है, इसी प्रकार दुःखों की प्राप्ति होने पर भी, [पहली अज्ञानदशा की तरह] उसको उद्वेग नहीं होता। क्योंकि वह तो दो दृष्टि वाला होजाता है [विपत्ति के पहाड़ के टूट पड़ने पर भी वह तो वैदिक ब्रह्मा- ३१

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