पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 488, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें४६६ पञ्चदशी नन्द को याद करके आनन्दमग्न हुआ रहता है जिस समय उसे दुःख हो रहा है उसी समय उसे ब्रह्मानन्द भी तो आरहा है वह उस को दुःखी होने नहीं देता] इत्थं जागरणे तत्वविदो ब्रह्मसुखं सदा । भाति,तद्वासनाजन्ये स्वप्ने तद् भासते तथा ॥१३२॥ इस प्रकार जागरण काल में चाहे तो सुखानुभव होता हो, चाहे दुःखानुभव हो रहा हो, और चाहे वे उदासीन होकर चुप चाप बैठे हों, तत्वज्ञानी लोगों को सदा ही ब्रह्मानन्द प्रतीत होता रहता है । केवल जागरण काल में ही नहीं किन्तु जाग्रत् की वासना से उत्पन्न होने वाले सपने में भी जाग्रत् अवस्था की तरह ही उनको ब्रह्मसुख भासा करता है । अविद्यावासनाऽप्यस्तीत्यतस्तद्वासनोत्थिते । स्वप्ने मूर्खवदेवैष सुखं दुःखं च वीक्षते ॥१३३॥ यह तो कहा ही नहीं जासकता कि केवल आनन्दवासना से ही सपने आते हों । सपने तो अविद्यावासना से भी आते हैं । इस कारण जो सपना अविद्या वासना से आता है, उस सपने में ज्ञानी को भी मूर्खों की तरह ही सुखं और दुःख देखने पड़ जाते हैं । ब्रह्मानन्दाभिधे ग्रन्थे ब्रह्मानन्दप्रकाशकम् । योगिप्रत्यक्षमध्याये प्रथमेऽस्मिन्नुदीरितम् ॥१३४॥ ब्रह्मानन्द नाम का जो पांच अध्याय का ग्रन्थ है उस के इस प्रथमाध्याय में, ब्रह्मानन्द को प्रकाशित करने वाले योगी के अनुभव का वर्णन किया गया है ।