भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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१६४ पञ्चदशी अपनी उदासीन' अवस्था में लगन के साथ, परमानन्द का स्वाद लेने को उद्यत रहता है, उसी तरह उसका यह स्वभाव हो जाता है कि—फिर वह सुख दुःख प्राप्त होने के समय या सुख दुःख के कारणों के प्राप्त होने के समय में भी [उन सब का विचार छोड़ छोड़ कर] आत्मानन्द का आस्वाद लेने में ही तत्पर रहने लगता है। अग्निप्रवेशहेतौ धीः शृङ्गारे यादृशी तथा। धीरस्योदेति विषयेऽनुसन्धानविरोधििन ॥१२७॥ सती होने वाली स्त्री के लिए जब अग्निप्रवेश का कारण उपस्थित हो जाता है। शीघ्र ही देहत्याग की बलवती दृढ़ इच्छा जब जाग उठती है तब उसको इस त्याग में विघ्न डालने वाले शृङ्गार की कुछ भी परवाह नहीं रहती। ठीक इसी प्रकार वैराग्यादि साधनसम्पन्न विवेकी को, उस विषयसुख की पर- वाह नहीं रहती, जो कि ब्रह्मानुसन्धान का विरोधी होता है। भाव यह है कि विषयसुख, विषयसम्पादन के प्रयत्न में पुरुष को इतना बहिर्मुख बना देता है कि वह पुरुष फिर आत्मा- नुसन्धान कर ही नहीं सकता। इस कारण विवेकी लोगों को वैषयिक सुख की इच्छा ही नहीं होती। भले ही उसको अनुकूल समझ कर संसारी लोग उसके लिए मरते फिरें। जैसे दुःख आत्मविचार का विरोधी होता है वैसे ही विषयसुख भी आत्म- विचार का विरोधी है। अविरोधिसुखे बुद्धिः स्वानन्दे च गमागमौ । कुर्वन्त्यास्ते क्रमादेषा काकाक्षिवदितस्ततः ॥१२८॥ कौवे की आंखों की तरह योगी की बुद्धि कभी तो आत्मा