भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८५ चान्द्रायण आदि व्रत किये जाते हैं [इन कृच्छ्रादि से कर्त्ता कहाने वाले विज्ञानमय का ही उपकार होता है। क्योंकि यही विज्ञानमय लोकान्तरगमन आदि किया करता है] मोक्ष्येऽहमित्यत्र युक्तं चिदात्मत्वं तदा पुमान् । तद्वेत्ति गुरुशास्त्राभ्यां न तु किंचिच्चिकीर्षति ॥४८॥ 'मुझे मुक्ति पानी है' यह विचार जब आता है तब इस विचार में चेतनतत्व ही आत्मा होना चाहिये। क्योंकि तब यह [ अधिकारी ] पुरुष गुरु [ आचार्योपदेश ] तथा शास्त्र [वाक्यार्थ] के विचार से उस चिदात्मतत्व को जान लेता है [कि मैं कर्ता भोक्ता आदि कुछ नहीं हूँ। मैं तो सच्चिदानन्द ब्रह्मतत्व ही हूँ] अपने इस रूप को जान चुकने के बाद यह पुरुष कुछ भी करना नहीं चाहता है। [ इस मोक्षव्यवहार में चेतन तत्व ही आत्मा होना चाहिये। इस में कर्ता आदि आत्माओं से काम नहीं चल सकता] विप्रक्षत्रादयो यद्वद् बृहस्पतिसवादिषु । व्यवस्थितास्तथा गौणमिथ्यामुख्या यथोचितम् ॥४९॥ विप्र क्षत्रिय आदि जिस प्रकार पृथक् पृथक् बृहस्पति सवादियों में व्यवस्थित हैं [ब्राह्मण को बृहस्पतिसव का ही अधिकार है। राजसूय क्षत्रिय ही कर सकता है। वैश्यस्तोम वैश्य को ही करना चाहिये] इसी प्रकार 'गौण' 'मिथ्या' या 'मुख्य' तीनों प्रकार के 'आत्मा' यथायोग्य अपने अपने व्यवहारों में प्रधान रहते हैं। तत्र तत्रोचिते प्रीति रात्मन्येवातिशायिनी । अनात्मनि तु तच्छेषे प्रीति रन्यत्र नोभयम् ॥५०॥