पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४८४ पञ्चदशी 'यह पढ़ने वाला तो अग्नि है' इस वाक्य में, पढ़ने के अयोग्य होने के कारण [वहाँ पर] विद्यमान भी अग्नि नहीं लिया जाता। किन्तु उचित होने के कारण पढ़ने के योग्य तीव्र बालक का ही अग्नि शब्द से ग्रहण किया जाता है [इस दृष्टान्त के अनुसार ही, अपने मरने के बाद घर की रक्षा करने के लिये, अपने आपे को छोड़ कर, पुत्र को ही 'आत्मा' माना जाता है।] कृशोऽहं पुष्टि माप्स्यामीत्यादौ देहात्मतोचिता । न पुत्रं विनियुङ्क्तेऽत्र पुष्टिहेत्वन्नभक्षणे ॥४६॥ 'मैं अब कृश होगया हूँ, अब घी दूध खा कर पुष्ट हो जाऊँगा'इत्यादि लौकिक व्यवहारों में तो जो देह के लिये पुष्टि- कारक अन्न खा सकता है उस को ही 'आत्मा' समझना चाहिये। देखते हैं कि कोई भी अपने शरीर की पुष्टि को लक्ष्य बना कर पुष्टि करने वाले अन्न का भोजन, पुत्र को नहीं कराता [किन्तु स्वयं अपने देह को ही कराता है। ऐसे स्थलों में मिथ्या आत्मा यह देह ही—प्रधान हो सकता है। मुख्यात्मा को तो कुछ खिलाया ही नहीं जासकता। गौणात्मा को खिलाने से अपने शरीर में पुष्टि नहीं आती] तपसा स्वर्ग मेष्यामीत्यादौ कर्त्रात्मतोचिता । अनपेक्ष्य वपुर्भोगं चरेत् कृच्छ्रादिकं ततः ॥४७॥ 'तप करके उससे स्वर्ग को पाऊँगा' इत्यादि व्यवहार.जब किया जाता है, तब कर्ता जो विज्ञानमय है, वही आत्मा होना चाहिये [इस व्यवहार में देहादि को आत्मा मानें तो काम नहीं चलता। क्यों कि देह तो यहीं जल कर भस्म हो जाता है] यही कारण है कि देह के भोगों को लात मार कर कृच्छ्र