पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 516, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें४९४ पञ्चदशी हो जाता है [ किन्तु वह तो सदानन्द रूप हो कर भासने लगता है ] परप्रेमास्पदत्वेन परमानन्दरूपता । सुखवृद्धिः प्रीतिवृद्धौ सार्वभौमादिषु श्रुता ॥७२॥ [यों यहां तक यह सिद्ध हो चुका कि] निरतिशय प्रेम का विषय होने से यह आत्मा परमानन्दरूप है । [ तैत्तिरीय और बृहदारण्यक श्रुतियों में बताया गया है कि] चक्रवर्ती राजा से लेकर हिरण्यगर्भपर्यन्त पदों में जहां जहां प्रीति की वृद्धि होती है, वहां वहां सुख की भी वृद्धि होती है । यों जब प्रीति की निरतिशयता भी समझ में आसकती है तब आनन्द की निरतिशयता भी समझी जा सकती है । [ राजा को अपने उपकरणों (साधनों) में प्रीति अधिक होती है तो उसे सुख भी अधिक ही होता है ] चैतन्यवत् सुखं चास्य स्वभावश्चेच्चिदात्मनः । धीवृत्तिष्वनुवर्तेत सर्वास्वपि चितिर्यथा ॥७३॥ शंका यह होती है कि—यदि चैतन्य के समान सुख या आनन्द भी चिदात्मा का स्वभाव हो, तो जैसे सब बुद्धिवृत्तियों में चैतन्य की अनुवृत्ति होती है वैसे सब बुद्धिवृत्तियों में आनन्द की भी अनुवृत्ति होनी चाहिये । मैव मुष्णप्रकाशात्मा दीपस्तस्य प्रभा गृहे । व्याप्नोति नोष्णता तद्वच्चित्तेरेवानुवर्तनम् ॥७४॥ यह शंका न करनी चाहिये । दृष्टान्त में देख लो कि— दीप के दो स्वरूप हैं एक 'उष्ण' दूसरा 'प्रकाश' । घर में जब दीपक जलता है तब उसकी प्रभा तो घर को व्याप्त कर लेती