भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४९५ है परन्तु उसकी उष्णता व्याप्त नहीं करती। ठीक इसी प्रकार बुद्धिवृत्तियों में चैतन्य की तो अनुवृत्ति हो जाती है परन्तु आनन्द की अनुवृत्ति नहीं होती। गन्धरूपरसस्पर्शेष्वपि सत्सु यथा पृथक् । एकाक्षेणैक एवार्थो गृह्यते नेतरस्तथा ॥७५॥ एक द्रव्य में गन्ध, रूप, रस और स्पर्श सभी रहते हैं, परन्तु एक इन्द्रिय, इनमें से एक ही गुण को ग्रहण करती है, दूसरे को नहीं। ठीक इसी प्रकार चैतन्य और आनन्द इन दोनों में से, केवल चैतन्य का भान लोगों को होता है, आनन्द का नहीं होता। चिदानन्दौ नैव भिन्नौ गन्धाद्यास्तु विलक्षणाः । इति चेत् तदभेदोऽपि साक्ष्यन्यत्र वा वद ॥७६॥ यदि कहा जाय कि—दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक में तो बड़ी विषमता है। क्योंकि चित् और आनन्द तो भिन्न नहीं हैं, गन्धादि तो परस्पर भिन्न भिन्न हैं। तो उत्तर देने से पहले यह बताओ कि—चित् और आनन्द का जो अभेद है वह साक्षी आत्मस्वरूप में है ? या कहीं अन्यत्र है [ या यह भेद उसकी उपाधि कहाने वाली वृत्तियों में है। पूछने का तात्पर्य यह है कि चिदानन्द का अभेद स्वाभाविक है या औपाधिक है ?] आद्ये गन्धाद्योऽप्येवमभिन्नाः पुष्पवर्तिनः । अक्षभेदेन तद्भेदे वृत्तिभेदात् तयोर्भिदा ॥७७॥ चित् और आनन्द का साक्षी में कोई भेद नहीं है, इस पक्ष में, पुष्प में रहने वाले गन्धादि भी इसी तरह [साक्षी में] परस्पर भेद रहित हैं। क्योंकि एक को छोड़कर एक को उस