पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 52, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ पञ्चदशी शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध ये आकाशादि पाँचों भूतों के गुण हैं । इन आकाशादियों में क्रम से एक दो तीन चार तथा पाँच गुण हैं । प्रतिध्वनिर्वियच्छब्दो वायौ वीसीति शब्दनम् । अनुष्णाशीतसंस्पर्शो वह्नौ भुगुभुगुध्वनिः ॥३॥ उष्णः स्पर्शः प्रभारूपं जले बुलबुलध्वनिः । शीतः स्पर्शः शुक्लरूपं रसो माधुर्यमीरितम् ॥४॥ भूमौ कडकडाशब्दः काठिन्यं स्पर्श इष्यते । नीलादिकं चित्ररूपं मधुराम्लादिको रसः ॥५॥ सुरभीतरगन्धौ द्वौ गुणाः सम्यग्विवेचिताः । आकाश में प्रतिध्वनि नाम का शब्द ही एक गुण है । वायु में 'वी सी' ऐसा शब्द तथा अनुष्णाशीत [ न गरम न ठण्डा ] स्पर्श ये दो गुण हैं । वह्नि में 'भुगुभुगु' शब्द, उष्ण स्पर्श तथा भास्वर रूप ये तीन गुण हैं । जल में 'बुलबुल' शब्द, शीतस्पर्श, शुक्लरूप, तथा मधुर रस, ये चार गुण हैं । पृथिवी में 'कडकडा' शब्द, कठिन स्पर्श, नीलादि चित्ररूप, मधुराम्लादि रस, तथा सुरभि असुरभि गन्ध, ये पाँच गुण हैं। यहाँ तक गुणों का विवे- चन समाप्त हुआ । श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा घ्राणं चेन्द्रियपंचकम् ॥६॥ कर्णादिगोलकस्थं तच्छब्दादिग्राहकं क्रमात् । सौक्ष्म्यात् कार्यानुमेयं तत् प्रायो धावेद्बहिर्मुखम् ॥७॥ श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा तथा घ्राण ये पाँच इन्द्रियाँ क्रम से कान आदि छिद्रों में रहती हैं । और शब्दादि गुणों को ग्रहण किया करती हैं। [क्योंकि] वे इन्द्रियाँ