पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[header] पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ३५ [/header] बनी हैं इसलिये ] इतनी सूक्ष्म हैं कि दिखाई नहीं पड़तीं । केवल [ उनके ] कार्य से ही इन का अनुमान किया जा सकता है। ये इन्द्रियाँ प्रायः करके बहिर्मुख हो जाती हैं और बाह्य विषय समूह में ही दौड़ लगाया करती हैं। कदाचित् पिहिते कर्णे श्रूयते शब्द आन्तरः । प्राणवायौ जाठराग्नौ जलपानेऽन्नभक्षणे ॥८॥ व्यज्यन्ते ह्यान्तराः स्पर्शा मीलने चान्तरं तमः । उद्गारे रसगन्धौ चेत्यक्षाणामान्तरग्रहः ॥९॥ [ पहले श्लोक में जो कि इन्द्रियों को प्रायः बहिर्मुख बताया गया है उस प्रायः का तात्पर्य यह है कि ] कभी कान को बन्द कर लेने पर प्राणवायु तथा पेट की अग्नि का आन्तर शब्द भी सुनाई पड़ा करता है ॥८॥ जल पीते समय तथा अन्न खाते समय अन्दर के स्पर्श भी प्रतीत हुआ करते हैं। उद्गार [ डकार ] आने पर तो अन्दर के रस तथा गन्ध दोनों ही ग्रहण में आते हैं। इस प्रकार इन्द्रियाँ अन्दर के विषयों का ग्रहण भी किया करती हैं। पञ्चोक्त्यादानगमनविसर्गानन्दकाः क्रियाः । कृषिवाणिज्यसेवाद्याः पञ्चस्खन्तर्भवन्ति ते ॥१०॥ वचन, आदान, गमन, विसर्ग तथा आनन्द ये पाँच क्रिया प्रसिद्ध ही हैं। खेती, वाणिज्य तथा सेवा आदि दूसरी क्रियायें भी इन्हीं पाँच क्रियाओं में अन्तर्भूत हो जाती हैं। [इसलिये मुख्य क्रिया पाँच ही हैं ] वाक्पाणिपादपायूपस्थैरक्षैस्तत्तत्क्रियाजनिः । मुखादिगोलकेष्वास्ते तत् कर्मेंन्द्रियपंचकम् ॥११॥