भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०७ दर्शन नहीं होने देते थे । परास्य शक्ति र्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च (श्वे० ६-८) इस में कहा गया है कि ] जगत् को बनाने वाली, उस ब्रह्म की पराशक्ति, नाना प्रकार की सुनी गयी है । वह माया शक्ति क्रिया ज्ञान और बल अर्थात् इच्छा रूप होती है * । इति वेदवचः प्राह, वसिष्ठश्च तथाब्रवीत् । सर्वशक्ति परं ब्रह्म नित्यमापूर्णमद्वयम् ॥१४॥ माया के विषय में उपर्युक्त बात श्रुतियों ने कही है। वसि- ष्ठमुनि ने भी इस मायाशक्ति की विचित्रता का वर्णन किया है। वे कहते हैं कि वह परब्रह्म सर्वशक्तियुक्त है, वह ब्रह्म नित्य पूर्ण और अद्वितीय है [ यों उन्होंने क्रमानुसार ब्रह्म के सोपा- धिक रूप का भी और निरुपाधिक रूप का भी कथन कर दिया है।] ययोल्लसति शक्त्यासौ प्रकाशमधिगच्छति । चिच्छक्तिर्ब्रह्मणो राम शरीरेषूपलभ्यते ॥१५॥ वह परब्रह्म, जब जब, जिस जिस, मायाशक्ति के कारण उल्लास किंवा विकास को प्राप्त हो जाता है, तब तब वह वह शक्ति हम पर प्रकट हो जाया करती है [अर्थात् जब वह शक्ति प्रकट नहीं भी होती तब भी अप्रकट दशा में ब्रह्म में यह जगत् रहता है । हे राम ! तुम देखलो कि देवनिर्यङ् मनुष्यादि शरीर में

  • कभी वह शक्ति ज्ञान रूप हो जाती है, फिर इच्छा रूप में दीखती है, फिर क्रिया रूप में हो जाती है, कभी कभी दो या तीनों रूप एक साथ धारण कर लेती है।