पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 530, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें५०८ पञ्चदशी वही चिच्छक्ति देखी जा रही है। [उस शक्ति के क्षुद्र कण ही नाना शरीरों की चेतना के रूप में जब तब प्रकट होते रहते हैं ] स्पन्दशक्तिश्च वातेषु दार्ढ्यशक्ति स्तथोपले । द्रवशक्तिस्तथाम्भःसु दाहशक्तिस्तथानले ॥१६॥ शून्यशक्तिस्तथाकाशे नाशशक्तिर्विनाशिनि । वायु में उसकी स्पन्दशक्ति प्रकट होती है। पत्थर में उसकी दार्ढ्य शक्ति अभिव्यक्त हो जाती है। जलों में उसकी द्रवशक्ति प्रकट दशा में देखी जा सकती है। अग्नि में उसकी दाहशक्ति देखने में आती है। आकाश में उसकी शून्यशक्ति पायी जाती है। विनाशी पदार्थों में उसकी नाशशक्ति को देख सकते हैं। यथाण्डेऽन्तर्महासर्पो जगदस्ति तथात्मनि ॥१७॥ [कहाँ तक कहें] जैसे सांप के अण्डे के भीतर महासर्प अनभिव्यक्त दशा में छिपा पड़ा रहता है, इसी प्रकार आत्मा में यह जगत् अनभिव्यक्त दशा में रहता है। फलपत्रलतापुष्पशाखाविटपमूलवान् । तनु बीजे यथा वृक्षस्तथेदं ब्रह्मणि स्थितम् ॥१८॥ फल फूल पत्ते लता शाखा टहनी और मूल वाला पेड़ जैसे एक बीज में [सूक्ष्म रूप में छिपा] रहता है इसी प्रकार यह विचित्र जगत् ब्रह्म में रहता है। क्वचित् काश्चित् कदाचिच्च तस्मादुद्यन्ति शक्तयः । देशकालविचित्रत्वात् क्ष्मातलादिव शालयः ॥१९॥ देश और काल के विचित्र होने के कारण कहीं किसी देश में और किसी काल में कोई कोई शक्तियें अभिव्यक्त हो जाती