पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 531, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५०९ हैं [सब शक्तियें एक स्थान और एक काल में ही उदित नहीं होतीं] देखते हैं कि भूमि में बहुत से बीज पड़े रहते हैं परन्तु वे सब एक साथ उदित नहीं होते। किन्तु किसी देश और किसी काल [ऋतु] में कोई कोई बीज अंकुर को उत्पन्न कर देते हैं। स आत्मा सर्वगो राम ! नित्योदितमहावपुः । यन्मनाङ् मननीं शक्तिं धत्ते तन्मन उच्यते ॥२०॥ हे राम ! सर्वत्र विद्यमान नित्य प्रकाशमान तथा देश कालादि की मर्यादा में कभी न आने वाले स्वरूप वाला वह आत्मा जिस समय [आत्मबोध कराने वाली] मनन शक्ति को [जो कि माया का परिणाम रूप है ] धारण कर लेता है, तब उसको 'मन' कहने लगते हैं । आदौ मनस्तदनुबन्धविमोक्षदृष्टी पश्चात् प्रपंचरचना भुवनाभिधाना । इत्यादिका स्थितिरियं हि गता प्रतिष्ठा- माख्यायिका सुभगवालजनोदितेव ॥२१॥ [मनन शक्ति का उल्लास जब होता है तब] पहले तो मन [उत्पन्न] होता है। उसके पश्चात् बन्ध और मोक्ष की कल्पना जाग पड़ती है। उसके अनन्तर पर्वत नगर नदी समुद्रादि प्रपंच की रचना - जिसको भुवन भी कहते हैं - हो जाती है। इस तरह की यह जगत् की अवस्था प्राणियों के जी में जम गई है [ कल्पित होने पर भी सच्ची सी प्रतीत होने लगती है ] कहानी सुनने के शौकीन बच्चों को सुनाई हुई कथा को जैसे वे बच्चे सच्ची ही मान लेते हैं, इसी प्रकार यह जगत् भी सत्य माना जाने लगा है।