भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 542, कुल 726 में से

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[भाव यह है कि पूर्वरूप को छोड़कर दूसरी अवस्था को प्राप्त होने के कारण दुग्धादि तो केवल परिणामी ही हैं। मिट्टी और सुवर्ण तो अवस्थान्तर को भी पा लेते हैं और अपने पूर्वरूप को भी नहीं छोड़ते हैं इस कारण वे 'परिणामी' भी हैं और 'विवर्त्त' भी हैं]। आरम्भवादिनः कार्ये मृदो द्वैगुण्यमापतेत् । रूपस्पर्शादयः प्रोक्ताः कार्यकारणयोः पृथक् ॥५२॥ [ 'परिणाम' और 'विवर्त्त' दोनों बात मान लेने पर भी मिट्टी आदि को आरम्भक नहीं मानते क्योंकि ] आरम्भवादी [नैयायिक आदि] के मत में तो घट आदि कार्यों में मिट्टी आदि कारण द्रव्य दुगुने दुगुने हो जायेंगे !, [उनके मत में कार्याकार से रहने वाली और कारणाकार से रहने वाली दो मिट्टी हो जांयगी। फिर उन दोनों मिट्टियों में गुरुत्वादि भी दुगुने दुगुने हो जांयगे] क्योंकि आरम्भवादी लोग कार्य के रूपस्प- र्शादि अलग मानते हैं और कारण के रूपस्पर्शादि को अलग बताते हैं। [अर्थात् वे कार्य कारण का भेद मानने वाले हैं। इस दोष के कारण हमें आरम्भवाद तो सर्वथा माननीय नहीं है] मृत् सुवर्णमयश्चेति दृष्टान्तत्रयमारुणिः । प्राहातो वासयेत् कार्यानृतत्वं सर्ववस्तुषु ॥५३॥ छान्दोग्य उपनिषत् में उद्दालक नाम वाले अरुणपुत्र ने 'मिट्टी' 'सुवर्ण' और 'लोहा' ये तीन दृष्टान्त कार्यों के अनृत होने में दिये हैं। कई दृष्टान्त देने का भाव यही है कि जब बहुत से पदार्थों में कार्यों का अनृत होना पाया जा रहा है तब फिर भूत भौतिक सभी पदार्थों में कार्यों के मिथ्यापन की वासना साधक लोग किया करें।

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