पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 543, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५२१ कारणज्ञानतः कार्यविज्ञानं चापि सोऽवदत् । सत्यज्ञानेऽनृतज्ञानं कथमत्रोपपद्यते ॥५४॥ छान्दोग्य में उसी अरुणिने ‘यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्यात्’ (छा० ६-१-४) इत्यादि वाक्यों में ‘कारण [मिट्टी आदि] के ज्ञान से घटादि सब कार्यों का ज्ञान हो जाता है’ ऐसा कहा है। इस पर प्रश्न यह होता है कि सत्य पदार्थ का ज्ञान हो जाने पर, उससे विलक्षण जो घटादि अनृत पदार्थ हैं उन का ज्ञान कैसे हो सकता है ? यह हमें समझाओ । समृत्कस्य विकारस्य कार्यता लोकदृष्टितः । वास्तवोऽत्र मृदंशोऽस्य बोधः कारणबोधतः ॥५५॥ अनृतांशो न बोद्धव्य स्तद्बोधानुपयोगतः । तत्त्वज्ञानं पुमर्थ स्या न्नानृतांशावबोधनम् ॥५६॥ लोक में मिट्टी के सहित घटादि विकार को ही कार्य कहते हैं [अकेले घटादि को नहीं] । सो इस कार्य में जो सच्चा मृद्भाग है इस सत्यांश का ज्ञान तो कारण के ज्ञान से ही हो जाता है । ५५। शेष रहा हुआ जो मिथ्या भाग है, वह तो ज्ञातव्य है ही नहीं। क्योंकि उसके ज्ञान का तो कुछ उपयोग ही नहीं होता । जो वस्तु तत्व है [ जिस वस्तु की बाधा नहीं होती ] उस वस्तु का ज्ञान किसी को हो, तो उससे ही जानने वाले का कुछ प्रयो- जन सिद्ध हो सकता है । इसी से तत्व ज्ञान को पुरुषार्थ माना गया है । अनृत भाग किंवा विकार को जानने का तो कुछ प्रयो- जन ही नहीं होता है ।