पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५२६ पञ्चदशी नन्दस्वरूप ] है । अवकाश उसका अपना निजी स्वरूप है । उसका जो यह निजीरूप है यही मिथ्या है । पहले कहे हुए वे तीनों रूप मिथ्या नहीं होते । न व्यक्तेः पूर्वमस्त्येव न पश्चाच्चापि नाशतः । आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत् तथा ॥६८॥ आकाश का जो वह अवकाश नाम का चौथा रूप है, वह आकाश के व्यक्त होने से पहले भी नहीं था और नाश हो जाने के पश्चात् भी न रहेगा । इस कारण वह तो मिथ्या ही है । विचार कर देख लो कि—आदि और अन्त में जो बात नहीं रहती वह मध्य में भी नहीं होती । [ भाव यह कि उत्पत्ति और विनाश के बीच बीच में प्रतीत होने वाला यह अवकाश असत् पदार्थ है ] अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येवेत्याह कृष्णोऽर्जुनं प्रति ॥६९॥ अर्जुन के प्रति कृष्ण भगवान् ने भी यही कहा है कि—ये भूत पहले भी अव्यक्त थे। हे भारत ! ये बीच में कुछ काल के लिये व्यक्त हो गये हैं। अन्त में जाकर ये फिर अव्यक्त में लीन हो जायेंगे। मृद्वत् ते सच्चिदानन्दा अनुगच्छन्ति सर्वदा । निराकाशे सदादीना मनुभूति र्निजात्मनि ॥७०॥ घटादि कार्यों में जैसे मिट्टी तीनों कालों में अनुगत रहती है, इसी प्रकार वे सच्चिदानन्द नाम के तीनों रूप, सदा अनुगत रहते हैं। जब आकाश नहीं रहता—