पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 549, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंजाते हैं] तब भी इन सच्चिदानन्द धर्मों का अनुभव अपने आत्मा में तो होता ही रहता है । अवकाशे विस्मृतेऽथ तत्र किं भाति ते वद । शून्यमेवेति चेदस्तु नाम तादृग् विभाति हि ॥७१॥ [ उसी का स्पष्टीकरण ] बताओ कि—जब तुम अवकाश को भूल जाते हो तब तुम्हें क्या भान होता रहता है ? यदि कहो कि शून्य का भान होता है तो हम कहेंगे कि अच्छा यों ही सही। तुम उसका नाम शून्य ही रख लो । वैसे तो अवकाशाभाव रूपसे प्रतीत होने वाली वह कोई वस्तु प्रतीत तो होती ही है । तादृक्त्वादेव तत्सत्व मौदासीन्येन तत् सुखम् । आनुकूल्यप्रातिकूल्यहीनं यत्तन्निजं सुखम् ॥७२॥ [ शून्य नजर आता है ऐसा तुम कहते हो] तादृक्पने के कारण अर्थात् उपर्युक्त रूप से प्रतीत होने के कारण ही उसकी सत्ता तो सिद्ध हो ही जाती है [ उसका स्वरूप तो मानना ही पड़ता है ] उस समय उदासीनावस्था होने के कारण वह तत्व सुख ही है । जो तत्व अनुकूल भी न हो और प्रतिकूल भी न हो वही तो निज सुख होता है । आनुकूल्ये हर्षधीः स्यात् प्रातिकूल्ये तु दुःखधीः । द्वयाभावे निजानन्दो निजदुःखं न तु क्वचित् ॥७३॥ आनुकूल्य हो तो हर्ष होता है । प्रातिकूल्य जान पड़े तो दुःख होता है । जब तो आनुकूल्य या प्रातिकूल्य कुछ भी प्रतीत नहीं होता तब 'निजानन्द' भासने लग पड़ता है । निजानन्द की तरह निज दुःख भी होता होगा ऐसी शंका मत करो। क्योंकि दुःख में निजपना तो कहीं देखा ही नहीं जाता ।