पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 559, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें[Header] ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५३७ साथ ही नामरूप भी प्रतीत होते हैं। अकेले सच्चिदानन्द की प्रतीति का क्या उपाय करें? यही बात इस श्लोक में बतायी है। एवं च निर्जगद् ब्रह्म सच्चिदानन्दलक्षणम् । अद्वैतानन्द एतस्मिन् विश्राम्यन्तु जनाश्चिरम् ॥१०४॥ जब तुम ब्रह्म को इस प्रकार निर्जगत् कर सकोगे तब वह ब्रह्म सच्चिदानन्द स्वरूप हो जायगा। [उसकी नामरूप धारी कालिमा धुल जायगी।] बस इसी को 'अद्वैतानन्द' कहते हैं। मुमुक्षुलोग चिरकाल तक इसी 'अद्वैतानन्द' में विश्राम लेते रहें। ब्रह्मानन्दाभिधे ग्रन्थे तृतीयेऽध्याय ईरितः । अद्वैतानन्द एव स्याज्जगन्मिथ्यात्वचिन्तया ॥१०५॥ ब्रह्मानन्द नाम के ग्रन्थ में तृतीयाध्याय समाप्त हुआ। जगत् के मिथ्यात्व की चिन्ता करने से 'अद्वैतानन्द' जाग उठता है। इतिश्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितपंचदश्यां ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दो नाम तृतीयोऽध्यायः