पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 560, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् योगेनात्मविवेकेन द्वैतमिथ्यात्वचिन्तया । ब्रह्मानन्दं पश्यतोऽथ विद्यानन्दो निरूप्यते ॥१॥ क्रमानुसार पहले तीन अध्यायों में वर्णित योग से या आत्म- विवेक से या फिर द्वैत के मिथ्यापन की चिन्ता करने से, जब कोई ब्रह्मानन्द के साक्षात् दर्शन कर रहा हो, उस समय उसको जो ज्ञानानन्द होता है उसी का निरूपण इस प्रकरण में किया जायगा । विषयानन्दवद् विद्यानन्दो धीवृत्तिरूपकः । दुःखाभावादिरूपेण प्रोक्त एष चतुर्विधः ॥२॥ जिस प्रकार वह विषयानन्द एक प्रकार की बुद्धिवृत्ति है, इसी प्रकार यह 'विद्यानन्द' भी एक प्रकार की बुद्धिवृत्ति ही है । इस विद्यानन्द को दुःखाभाव आदि चार प्रकार का कहते हैं । दुःखाभावश्च कामाप्तिः कृतकृत्योहमित्यसौ । प्राप्तप्राप्योहमित्येव चातुर्विध्यमुदाहृतम् ॥३॥ (१) मुझे कोई भी दुःख नहीं, (२) मेरी सब कामनायें पूर्ण हो गई हैं, (३) मैं कृतकृत्य हो गया हूँ, (४) मुझे जो पाना था सो प्राप्त हो गया है, यों 'विद्यानन्द' चार प्रकार का होता है ।