भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पृष्ठ 563

ब्रह्मानन्दे विद्यानन्दप्रकरणम् ५४१ तत्त्व का विवेक कर लिया जाता है [जब उस आत्मतत्त्व को इस सब नामरूपात्मक जगत् से पृथक् पहचान लिया जाता है] जब ज्ञानी को कोई भी सच्चा भोग्य नहीं दीख पड़ता [जब वह इस प्रपंच को मिथ्या मान लेता है] तब बताओ कि वह परात्मा का जानने वाला ज्ञानी कौन से भोग्य की इच्छा करे ? आत्मानन्दोक्तरीत्यास्मिन् जीवात्मन्यवधारिते । भोक्ता नैवास्ति कोऽप्यत्र, शरीरे तु ज्वरः कुतः ॥११॥ आत्मानन्द नाम के १२वें अध्याय में बतायी हुई रीति से जीवात्मा के [असंग कूटस्थ चैतन्य] स्वरूप का निश्चय जब किसी को हो जायगा तब फिर कोई भी भोक्ता [या कामयिता] ही नहीं रहेगा [ विचार की आंच के सामने भोक्तृ भाव जल जायगा] ऐसी अवस्था में इस विचारे जड़ शरीर में ज्वर होगा ही कैसे ? [ इसको ज्वर के होने का पता कैसे चलेगा ? ] पुण्यपापद्वये चिन्ता दुःखमामुष्मिकं भवेत् । प्रथमाध्याय एवोक्तं चिन्ता नैनं तपेदिति ॥१२॥ पुण्य या पाप करने की इच्छा [नीयत] ही पारलौकिक दुःख कहाता है । प्रथमाध्याय में [ ११ वें प्रकरण में ] बताया गया है कि इस ज्ञानी को तो चिन्ता सताती ही नहीं । यथा पुष्करपर्णेऽस्मिन्नपामश्लेषणं तथा । वेदनादूर्ध्वमागामि कर्मणोऽश्लेषणं बुधे ॥१३॥ जैसे इस कमल के पत्ते में पानी का संपर्क नहीं होता इसी प्रकार आत्मज्ञान हो जाने के बाद इस ज्ञानी में आगामी कर्मों का सम्बन्ध नहीं होता ।