पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 564, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें५४२ पञ्चदशी उसे नहीं रहती । यही बात तद्यथा पुष्करपर्णे इत्यादि श्रुति में कही गयी है । ] इषीकातृणतूलस्य वह्निदाहः क्षणाद् यथा । तथा संचितकर्मास्य दग्धं भवति वेदनात् ॥१४॥ तद्यथेषीकतूल मग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवं हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते (छा. ५-२४-३) इस श्रुति में कहा गया है कि जैसे सर कण्डे या कांस की रूई, आग में एक क्षण में जल जाती है, इसी प्रकार ज्ञानी के [ करोड़ों कल्पों से ] संचित किये हुए कर्म भी ज्ञान [ के माहात्म्य ] से [ तत्क्षण ] दग्ध हो जाते हैं । [ यों उसे संचित कर्मों की चिन्ता भी नहीं रह जाती ] कि इन का क्या बनेगा ? ] यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा ॥१५॥ गीता में भी कहा है कि—हे अर्जुन ! जिस प्रकार प्रदीप्त अग्नि ईंधनों को जला डालती है, इसी प्रकार [ सुलगी हुई ] यह ज्ञानाग्नि भी, तीनों प्रकार के कर्मों [ क्रियमाण आगामी और संचित ] को भस्मसात् कर देती है । यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापि स इमांल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥१६॥ गीता में ही यह भी कहा है कि—जिस ज्ञानी को अहंकार युक्त भाव नहीं रहता, [ कि यह मैं करता हूँ मैं करने वाला हूँ ] जिस ज्ञानी की बुद्धि संसार में लिप्त नहीं होती, वह यदि इन सब लोकों को मार भी दे, तो भी वह मारने वाला नहीं समझा जाता और इस कर्म से वह बन्धन में भी नहीं आ सकता ।