भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 581, कुल 726 में से

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ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् ५५९ ठीक होगा ? इस बात का उत्तर यह है कि ]—यह चांद जब मैले जल में प्रविष्ट होता है तब यह भी अस्पष्ट दीखने लगता है, परन्तु निर्मल जल में स्पष्ट दीख पड़ता है । ठीक इसी प्रकार ब्रह्म तत्व भी शुद्ध और अशुद्ध वृत्तियों में दो तरह का हो जाता है । घोरमूढासु मालिन्यात् सुखांशश्च तिरोहितः । ईषन्नैर्मल्यतस्तत्र चिदंशप्रतिविम्बनम् ॥९॥ [ ऊपर की बात को विस्तार से यों समझो कि ]—घोर और मूढ वृत्तियों में मलिनता के कारण सुख भाग ढका हुआ रहता है । उन वृत्तियों में थोड़ी सी निर्मलता होती है इस कारण केवल चिदंश का ही प्रतिबिम्ब हुआ रहता है । यद्वापि निर्मले नीरे वह्ने रौष्ण्यस्य संक्रमः । न प्रकाशस्य, तद्वत् स्याच्चिन्मात्रोद्भूतिरेव च ॥१०॥ अथवा दूसरे दृष्टान्त से इस बात को यों समझो कि निर्मल जल में अग्नि की उष्णता तो पहुंच जाती है परन्तु अग्नि का प्रकाश उसमें नहीं पहुंच पाता । ठीक इसी तरह घोर और मूढ वृत्तियों में चिदंश ही पहुंच पाता है [ परन्तु 'सुखांश' का संक्रमण उनमें नहीं होता ] काष्ठे त्वौष्ण्यप्रकाशौ द्वावुद्भवं गच्छतो यथा । शान्तासु सुखचैतन्ये तथैवोद्भूतिमाप्नुतः ॥११॥ काष्ठ में तो जैसे उष्णता और प्रकाश दोनों ही उद्भूत हो जाते हैं, इसी प्रकार शान्त वृत्तियों में भी 'सुख' और 'चैतन्य' दोनों ही उद्भूत हो जाते हैं ।

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