पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५५८ पञ्चदशी
वृत्तिष्वेतासु सर्वासु ब्रह्मणश्चित्स्वभावता । प्रतिबिम्बति, शान्तासु सुखं च प्रतिबिम्बति ॥५॥ ऊपर कही हुई इन सभी वृत्तियों में ब्रह्म की चित्स्वभावता प्रतिबिम्बित हो रही है। शान्त वृत्तियों में इतनी विशेषता होती है कि उनमें चेतनता के साथ ही सुख भी प्रतिबिम्बित होता है। रूपं रूपं बभूवासौ प्रतिरूप इति श्रुतिः । उपमा सूर्यकेत्यादि सूत्रयामास सूत्रकृत् ॥६॥ श्रुति में कहा है कि यह आत्मा प्रत्येक रूप के अनुरूप हो गया है। अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् (ब्रह्मसू. ३-२-१८) इस में व्यास ने भी यही बात कही है। [जैसे यह ज्योतिर्मय सूर्य स्वयं एक है परन्तु जलपात्रों के भेद से भेदयुक्त जलों के अनु- सार अनेक हो जाता है इसी प्रकार अजन्मा यह आत्मदेव स्वयं- प्रकाश और एक ही है परन्तु माया रूपी उपाधि से शरीरों के अनुसार होकर भिन्न (अनेक) सा हो जाता है ] एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥७॥ श्रुति कहती है कि सब भूतों में एक ही तो भूतात्मा व्यवस्थित हो रहा है। वह [ ज्ञानी को ] एक रूप में और [ अज्ञानी को ] जल के चांद की तरह अनेक रूप में दीख पड़ता है। जले प्रविष्टश्चन्द्रोऽयमस्पष्टः कलुषे जले । विस्पष्टो निर्मले, तद्वद् द्वेधा ब्रह्मापि वृत्तिषु ॥८॥ [ निरवयव ब्रह्म कहीं तो चिन्मात्ररूप से प्रतीत हो और कहीं चैतन्य और आनन्द दोनों का भान हो, यह विभाग कैसे ·