पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 579, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् अथात्र विषयानन्दो ब्रह्मानन्दांशरूपभाक् । निरूप्यते द्वारभूतस्तदंशत्वं श्रुतिर्जगौ ॥१॥ अब इस ग्रन्थ में ब्रह्मानन्द के ही एक भाग 'विषयानन्द' का निरूपण कर रहे हैं । क्योंकि वह भी ब्रह्मज्ञान का उपयोगी है । श्रुति ने भी अपने मुख से इस विषयानन्द को ब्रह्मानन्द का ही एक भाग कहा है । एषोऽस्य परमानन्दो योऽखण्डैकरसात्मकः । अन्यानि भूतान्येतस्य मात्रामेवोपभुञ्जते ॥२॥ श्रुति ने कहा है कि—जो कि अखण्ड और एकरस आनन्द है वही तो उस ब्रह्म का परमानन्द कहाता है । ये सम्पूर्ण भूत इसी परमानन्द की एक बूंद की किसी छोटी सी मात्रा को ही तो भोग रहे हैं । शान्ता घोरास्तथा मूढा मनसो वृत्तयस्त्रिधा । वैराग्यं क्षान्तिरौदार्य मित्याद्याः शान्तवृत्तयः ॥३॥ तृष्णा स्नेहो रागलोभावित्याद्या घोरवृत्तयः । संमोहो भयमित्याद्याः कथिता मूढवृत्तयः ॥४॥ मन की शान्त घोर तथा मूढ ये तीन तरह की वृत्तियां होती हैं । वैराग्य, क्षमा, उदारता आदि 'शान्त' वृत्तियां कहाती हैं । तृष्णा, स्नेह, राग, तथा लोभ आदि 'घोर' वृत्तियां हैं । संमोह तथा भय आदि 'मूढ' वृत्तियां कही गयी हैं । [ शान्त वृत्तियां सात्विक हैं, घोर वृत्तियां राजस होती हैं, मूढ वृत्तियां तामसी वृत्तियां मानी गयी हैं ] ।