भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 585, कुल 726 में से

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ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् ५६३ असत्ता जाड्यदुःखे द्वे मायारूपं त्रयं त्विदम् । असत्ता नरशृङ्गादौ जाड्यं काष्ठशिलादिषु ॥२३॥ घोरमूढधियोर्दुःखमेवं माया विजृम्भिता । शान्तादिबुद्धिवृत्त्यैक्यान्मिश्रं ब्रह्मेति कीर्तितम् ॥२४॥ 'असत्ता' 'जडता' तथा 'दुःख' ये तीनों ही माया के स्वरूप हैं। जिनमें से 'असत्ता' मनुष्य के सींगों में होती है, 'जडता,' काष्ट और शिला आदि में पाई जाती है । घोर और मूढ वृत्तियों में दुःख रहता है। इस प्रकार संसार में सब ही जगह माया का प्रतिभास हो रहा है। बुद्धि की जो शान्त आदि वृत्तियाँ हैं उनके साथ एकता हो जाने के कारण वह ब्रह्म शान्त आदि वृत्तियों में मिश्रित हो जाता है। एवं स्थितेऽत्र यो ब्रह्म ध्यातुमिच्छेत् पुमानसौ । नृशृङ्गादिमुपेक्षेत शिष्टं ध्यायेद् यथायथम् ॥२५॥ यह सब कुछ हमने इसलिए कहा है कि जो पुरुष ब्रह्मतत्व का ध्यान करना चाहे, नृशृंगादि के समान मिथ्या पदार्थों की उपेक्षा करके [ जो तत्व शेष रह जाता है, उस ] शेष रहे हुए तत्व का ध्यान यथा योग्य रीति से करता रहे । शिलादौ नामरूपे द्वे त्यक्त्वा सन्मात्रचिन्तनम् । त्यक्त्वा दुःखं घोरमूढधियोः सच्चिद्विचिन्तनम् ॥२६॥ शान्तासु सच्चिदानन्दांस्त्रीनप्येवं विचिन्तयेत् । कनिष्ठमध्यमोत्कृष्टास्तिस्रश्चिन्ताः क्रमादिमाः ॥२७॥ शिलादि के नाम रूपों को छोड़ कर सन्मात्र का चिन्तन करना चाहिए। घोर और मूढ बुद्धियों में से तो दुःख को छोड़ कर ब्रह्म के सच्चिद्रूप का चिन्तन करना चाहिए। सात्विक

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