भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पृष्ठ 586

५६४ पञ्चदशी शान्त वृत्तियों में तो सत्-चित् तथा आनन्द इन तीनों को भी इसी तरह ध्यान करना चाहिए । ये ऊपर कही तीनों चिन्तायें क्रमानुसार कनिष्ठ मध्यम और उत्कृष्ट कहाती हैं। ये तीनों चिन्तायें एक समान नहीं हैं । मन्दस्य व्यवहारेऽपि मिश्रब्रह्मणि चिन्तनम् । उत्कृष्टं वक्तुमेवात्र विषयानन्द ईरितः ॥२८॥ [ जिन मन्द लोगों को निर्गुण ब्रह्म का ध्यान करने का अधिकार नहीं है, वे ] मन्द लोग मिश्र [ सोपाधिक ] ब्रह्म का चिन्तन व्यवहार काल में भी करते रहें तो उनके लिये यही उत्कृष्ट बात है । इसी बात को बताने के लिये विषयानन्द का वर्णन हमने किया है । औदासीन्ये तु धीवृत्तेः शैथिल्यादुत्तमोत्तमम् । चिन्तनं, वासनानन्दे ध्यानमुक्तं चतुर्विधम् ॥२९॥ उदासीनावस्था में धीवृत्ति के शिथिल हो जाने पर [ बिना वृत्ति का] सर्वोत्तम चिन्तन [ध्यान] हो जाता है । यों वासना- नन्द में ध्यान चार प्रकार का हो गया । उदासीनता के आ जाने पर बुद्धिवृत्ति के शिथिल हो जाने के कारण [ जब कि किसी प्रकार की भी वृत्ति शेष नहीं रह जाती ] यह बिना वृत्ति का ध्यान सब ध्यानों से ऊँचे दर्जे का माना गया है । इस विषयानन्द नाम के प्रकरण में यहां तक चार प्रकार का ध्यान बताया जा चुका । तीन तरह का सवृत्तिक ध्यान ऊपर के श्लोकों में बताया गया है । इस श्लोक में चौथे अवृत्तिक ध्यान का वर्णन किया गया है । जड में सत्ता का ध्यान