भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पृष्ठ 587

ब्रह्मानन्दे विषयानन्दप्रकरणम् ५६५ मूढ में सत्ता और चैतन्य का ध्यान, सात्विक में सत्ता चित् तथा आनन्द का ध्यान यों तीन तरह का सवृत्तिक ध्यान है। न ध्यानं ज्ञानयोगाभ्यां ब्रह्मविद्यैव सा खलु। ध्यानेनैकाग्र्यमापन्ने चित्ते विद्या स्थिरीभवेत् ॥३०॥ इस ब्रह्मानन्द नाम के ग्रन्थ में ज्ञान और योग के द्वारा जिस ध्यान को बताया है वह कोई ध्यान नहीं है। वह तो ब्रह्मविद्या ही है। ध्यान करते करते जब चित्त एकाग्र हो जाता है तब यह ब्रह्मविद्या स्थिर हो जाती है। [इसका स्थिर हो जाना ही इसका उत्पन्न होना कहाता है ] विद्यायां सच्चिदानन्दा अखण्डैकरसात्मताम् । प्राप्य भान्ति न भेदेन भेदकोपाधिवर्जनात् ॥३१॥ विद्या [ज्ञान-साक्षात्कार] हो जाने पर तो सत् चित् आनन्द ये तीनों ही अखण्ड एकरस होकर दीखने लगते हैं। फिर ये तीनों पृथक् पृथक् नहीं रहते। क्योंकि उस समय भेदक उपाधियां ही शेष नहीं रहतीं । शान्ता घोराः शिलाद्याश्च भेदकोपाधयो मताः । योगाद् विवेवतो वैषामुपाधीनामपाकृतिः ॥३२॥ शान्त या घोर वृत्तियां तथा शिला आदि पदार्थ ही भेदक उपाधियें मानी गयी हैं। इन उपाधियों का परिहार या तो 'योग' से हो सकता है या फिर 'विवेक' [ज्ञान] से ही इनका परिहार किया जा सकता । निरुपाधिब्रह्मतत्वे भासमाने स्वयंप्रभे । अद्वैते त्रिपुटी नास्ति भूमानन्दोऽत उच्यते ॥३३॥ इस सब का निचोड़ यही है कि—जब उपाधि रहित स्वयं-