भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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८ पञ्चदशी

है कि मैं तो परब्रह्म तत्व 'ही हूँ'। इतने से पर और अपर आत्मा की एकता की सम्भावना तो पाठकों के हृदय में बैठ ही जाती है। तत्वमसि आदि जो महावाक्य हैं वे इसी एकता की साक्षी देकर चले जाते हैं। अधिकारी लोग इन वाक्यों को जब विधिपूर्वक सुनते हैं तब उन्हें अखण्ड सच्चिदानन्द ब्रह्म की दिव्य सूचना मिल ही जाती है। श्रवण और मनन के प्रताप से जब इस परमार्थ में की विचिकित्सार्यें भाग जाती हैं और इसी परमार्थ में चित्त को ठहरा कर, तैल की धारा के समान एकाकार वृत्ति का प्रवाह बहा दिया जाता है, तब बस यही 'निदिध्यासन' कहाता है। इस निदि- ध्यासन की जब परिपाकावस्था आती है तब उसके माहात्म्य का क्या वर्णन करें। तब तो ध्याता और ध्यान दोनों ही खोये जाते हैं। उस समय के ध्येयैकगोचर चित्त की अलौकिक अवस्था को तो ऐसा समझो जैसा कि वायुरहित प्रदेश में जलता हुआ या चित्र में खींचा हुआ कोई दीपक ही हो। ऐसी अवस्था जब किसी के चित्त की हो जाय तब उसे समझ लेना चाहिए कि 'समाधि' होने लगी है। इस समाधि का महाद्भुत प्रताप यह है कि हमने अनादिकाल से जो अनन्त कर्मों के कूड़े इकट्ठे कर रक्खे हैं वे सब के सब इस समाधि से नष्ट हो जाते हैं। शुद्ध धर्म की वृद्धि होने लगती है, जिससे कार्यसहित अविद्या को मार भगाने वाला साक्षात्कार आ धमकता है। इस समाधि को करते करते जब सम्पूर्ण वासनाजाल विनष्ट हो चुके हों, जब पुण्य पाप नाम के कर्मों के ढेर का समूल उन्मूलन हो चुका हो, तब कहीं जाकर 'तत्वमसि' आदि वाक्यों का सच्चा अर्थ समझ में आया करता है। ऐसी उदार अवस्था के आने से पहले पहले